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सीमा झा/नई दिल्ली। छोटी-छोटी बातों पर अधीर हो जाना, मूड स्विंग होना, कभी गुस्सा तो कभी खुश हो जाना, ये सभी संकेत बताते हैं कि मन अशांत हो गया है। किसी काम में मन एकाग्र नहीं रह पाता। ऐसे में क्या करते हैं आप? इन्हें अपना स्वभाव मान लेते हैं या अपनी उलझन को किसी के साथ साझा करना चाहते हैं?
ये दो सवाल हैं जो यह तय कर सकते हैं कि आप मन की सेहत को लेकर कितने गंभीर रहते हैं। यह सही है कि आज मानसिक सेहत को लेकर बातें हो रही हैं, पर भावनात्मक सपोर्ट सिस्टम कमजोर हो रहा है। किसी से अपने मन की बात साझा करने से पहले सोचना पड़ता है।
आज समय नहीं है, समय बर्बाद नहीं करना, अपने काम से काम रखने जैसा सोच बताता है कि मशीनों पर निर्भरता ने हमें आत्मकेंद्रित बना दिया है और अधिक से अधिक बेहतर करने या पाने को लेकर कितने दबाव में रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन संकेतों को देखकर हमें थोड़ा ठहरकर अपने मन को टटोलने की जरूरत है।
विकराल होती चुनौती
विश्व स्वास्थ्य संगठन मानसिक सेहत को एक आपदा घोषित कर चुका है। बीते दिनों आर्थिक सर्वेक्षण में बच्चों में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों को लेकर आगाह किया गया है। घरेलू समस्याएं हों या कार्यस्थल का तनाव, सामाजिक अलगाव हो या अकेलापन या सड़क पर दिख जाने वाली संवेदनहीनता, ये सभी इसी आपदा की पहचान हैं।
ये सभी न तो संक्रामक बीमारी हैं न ही यह शारीरिक बीमारी के रूप में नजर आते हैं, वास्तव में हरदम हंसते रहने या ठीक-ठाक नजर आने वाले लोग भी किसी न किसी मानसिक समस्या से पीड़ित हो सकते हैं। इस संकट को हल्के में लेने से आगे ये गंभीर समस्या का रूप ले सकते हैं। इसके लिए स्वयं आगे आकर मानसिक सेहत के लिए सकारात्मक पहल करनी चाहिए।
कार्टिसोल को जानें
तनाव या गुस्से के कारणों पर विचार करें। इसके लिए स्वयं को ही केवल दोषी न ठहराएं। एम्स दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. नंद कुमार के अनुसार, कुछ लोग अधिक गुस्सा करने को लेकर स्वयं को भी कोसने लगते हैं। यह उनके गुस्से को स्वभाव का हिस्सा बना सकता है और कामकाजी व निजी जीवन को खराब कर सकता है।
इसका असर उनकी सेहत पर सबसे अधिक पड़ता है। दरअसल, इससे स्ट्रेस हार्मोन कार्टिसोल बढ़ता है जो शरीर में तनाव से निपटने की प्रतिक्रिया में जारी होता है पर तनाव बढ़ता रहे तो इसका स्तर भी अधिक बढ़ जाता है। यह इंसुलिन प्रतिरोध व मांसपेशियों की हानि का जिम्मेदार होता है। साथ ही मोटापा भी हो सकता है।
मन के ‘एंटीबॉडीज’!
शरीर की एंटीबाडी की तरह मन के भी ‘एंटीबाडीज’ होते हैं यानी वे संसाधन जो नकारात्मक विचारों रूपी सूक्ष्मजीवियों से मन की रक्षा करते हैं। हंगरी के पाजिटिव साइकोलाजी के प्रोफेसर एटिलिया ओलाह ने ऐसे 16 संसाधनों के बारे में बताया है, जो मन की एंटीबाडीज हो सकते हैं।
मन के 16 एंटीबाडीज में सकारात्मक सोच, स्थिति को नियंत्रित करने की समझ, खुद के बारे में रचनात्मक विचार, आत्मविकास की समझ, लक्ष्य की ओर देखने की क्षमता और भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता आदि हैं।
थोड़ा प्रयास, बड़ा प्रभाव
‘मैं चिंताओं से जूझ रहा हूं या मैं इसका आदी हूं, मैं ऐसा ही व्यक्ति हूं’ जैसे सोच से आप सकारात्मक बदलाव की दिशा में नहीं बढ़ सकते।
किसी भी तरह के असुरक्षा के भाव से निकलने के लए खुद को सक्रिय रखें, छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर काम करें।
माइंडफुलनेस का अभ्यास यानी मन को वर्तमान में केंद्रित कर पाने का अभ्यास इसमें आपकी खास मदद करेगा। इससे ‘आप खतरे में हैं’ या ‘सामर्थ्य नहीं है’, ‘लोग प्यार नहीं करते’ आदि विचारों से दूर रह सकेंगे।
थकान महसूस हो, कसरत न कर सकें तो कम से कम लंबी सांस लेने का अभ्यास करना चाहिए।
दिनचर्या में एरोबिक एक्सरसाइज जैसे, जागिंग, स्वीमिंग आदि को शामिल कर सकते हैं ताकि खुश रखने वाले हार्मोन एंर्डोफिन का उत्सर्जन बढ़े।
स्ट्रेस हार्मोन कार्टिसोल का स्तर कम करने के लिए पर्याप्त नींद जरूरी है। स्वस्थ खानपान की आदतों का भी विकास करना चाहिए।
इन संकेंतों से करें स्वयं पहचान
नींद का बार-बार खुलना, बहुत सोना या कम नींद आना।
सांस लेने में तकलीफ।
गर्दन, पीठ दर्द या कमर दर्द की शिकायत।
निरंतर मनोदशा में बदलाव होते रहना।
स्वयं को हीन या व्यर्थ समझना।
आत्मसम्मान में कमी, भविष्य के प्रति निराशा आदि।
समयानुकूल उचित भावनात्मक प्रतिक्रिया का
अभाव।
यह है जरूरी
छिपाएं नहीं, मन की समस्याओं को भी शारीरिक परेशानी की तरह स्वजन से साझा करें।l आसपास के लोगों को सुनें। कई बार सुनना भी मानसिक सेहत की उपचार का पहला कदम होता है। बीते तीन-चार वर्षों में देश में एंटीडिप्रेसेंट दवाइयों का इस्तेमाल 64 प्रतिशत तक बढ़ गया है। 2020 में देशभर में इन दवाओं का बाजार 1,540 करोड़ रुपये का था, जो कि नवंबर 2024 तक बढ़कर 2,536 करोड़ रुपये हो गया है।
इसका सीधा अर्थ कि लोग इन दवाइयों की खरीद कर रहे हैं या इसे जरूरी मान रहे हैं। बता दें कि 17 प्रमुख दवा कंपनियों पर नजर रखने वाले डेटा फार्मारैक के आंकड़ों में इस तथ्य का खुलासा हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा अनुमानों के अनुसार, दुनिया में एक अरब से अधिक लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं और हर साल 7 लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं।
डिप्रेशन का हाइपरटेंशन व ऑस्टियोआर्थराइटिस कनेक्शन
ब्रिटेन की एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के एक शोध अनुसार, अवसादग्रस्त व्यक्ति में सामान्य से 30 प्रतिशत अधिक आस्टियोआर्थराइटिस और हाइपरटेंशन होने की आशंका रहती है।










