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कोलकाता। बंगाल की सत्ता का गलियारा ‘नवान्न’ (सचिवालय) उन 126 सीटों से होकर गुजरता है, जिसे ‘ग्रेटर कोलकाता’ का राजनीतिक हृदयस्थल कहा जाता है। कोलकाता, उत्तर व दक्षिण 24 परगना, हावड़ा, हुगली और नदिया-ये छह जिले केवल भूगोल नहीं, बल्कि बंगाल की ‘भद्रलोक’ संस्कृति और सत्ता की चाबी हैं। 2026 के चुनावी शंखनाद के बीच भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन 126 सीटों के उस ‘अबूझ पहेली’ को सुलझाना है, जिसने 2021 में भगवा रथ को निर्णायक रूप से रोक दिया था।
2021 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा ‘अबकी बार 200 पार’ का हुंकार भर रही थी, तब इसी क्षेत्र ने उसे धरातल का बोध कराया था। इन 126 सीटों में से भाजपा के खाते में मात्र 18 सीटें आई थीं, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 107 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल कर ‘अजेय’ होने का संदेश दिया था।
कोलकाता, हावड़ा और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में तो भाजपा का खाता तक नहीं खुल सका। यहां तक कि विपक्ष के नाम पर केवल वाम-कांग्रेस समर्थित इंडियन सेक्युलर फ्रंट ने एक सीट जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।
शहरी मतदाता, भाजपा के लिए अब भी पहेली
वहीं, ग्रेटर कोलकाता का सामाजिक-राजनीतिक ढांचा बेहद जटिल है। इन छह जिलों का राजनीतिक मिजाज राज्य की दिशा तय करता है। यहां का ‘भद्रलोक’ वर्ग—शिक्षित, मध्यमवर्गीय और राजनीतिक रूप से सजग मतदाता—अब भी तृणमूल के साथ मजबूती से खड़ा नजर आता है। प्रबुद्ध वर्ग ही नहीं 2024 के लोकसभा चुनावों के विधानसभा-वार रुझान भी बताते हैं कि इस शहरी और अर्ध-शहरी बेल्ट में तृणमूल की पकड़ बरकरार है। भ्रष्टाचार के आरोपों और संदेशखाली जैसे मुद्दों के बावजूद, ‘लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री ’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं ने महिला और गरीब वोटरों को मजबूती से जोड़े रखा।
नदिया बना अपवाद, मतुआ फैक्टर अहम
हालांकि, 2021 में इन छह जिलों में नदिया भाजपा के लिए एकमात्र उम्मीद की किरण बना था, जहां पार्टी ने 17 में से नौ सीटें जीती थीं। यहां मतुआ समुदाय का प्रभाव निर्णायक रहा। 2026 में भी भाजपा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के क्रियान्वयन को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर इसी समर्थन को और मजबूत करने की कोशिश में है। परंतु,मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआइआर) में मतुआ समुदाय के लोगों का कितना नाम कटा है यह एक बड़ा फैक्टर है।
जनसांख्यिकी, समीकरणों का सबसे बड़ा खेल
ज्ञात हो कि, ग्रेटर कोलकाता की राजनीति को समझने के लिए इसके जनसांख्यिकीय संतुलन को समझना जरूरी है। वर्ष 2011 की जणगणना के अनुसार दक्षिण 24 परगना में मुस्लिम आबादी लगभग 36 प्रतिशत, उत्तर 24 परगना में करीब 26 प्रतिशत है। कोलकाता में 21, हावड़ा में 26,नदिया में 27 और हुगली में भी यह आंकड़ा प्रभावशाली है। यह बड़ा वोट बैंक अब तक तृणमूल के साथ रहा है।
वहीं अनुसूचित जाति (करीब 23.5 प्रतिशत) और मतुआ समुदाय का रुझान भाजपा के लिए अवसर पैदा करता है, लेकिन ओबीसी और शहरी सामान्य वर्ग आर्थिक मुद्दों पर बंटा हुआ दिखता है। भाजपा की राह में सबसे बड़ा रोड़ा यहां की जनसांख्यिकीय जटिलता है। इन जिलों में मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा ‘सालिड ब्लाक’ है, जो अब तक तृणमूल के पाले में मजबूती से खड़ा रहा है।
वहीं, नदिया और उत्तर 24 परगना में मतुआ समुदाय (एससी) निर्णायक है। हालांकि भाजपा ने सीएए के जरिए इन्हें साधने की कोशिश की है, लेकिन तृणमूल की ‘स्थानीयता’ और ‘जमीन के अधिकार’ वाली राजनीति कड़ी टक्कर दे रही है।
2026 में बदली रणनीति, पर चुनौती बरकरार
दरअसल, इस बार भाजपा केवल ध्रुवीकरण की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, ‘पन्ना प्रमुख’ माडल को सक्रिय करने और कम अंतर से हारी सीटों पर फोकस उसकी नई रणनीति का हिस्सा है। खासकर हुगली और उत्तर 24 परगना की वे सीटें, जहां 2021 में हार का अंतर पांच प्रतिशत से कम था, पार्टी के टारगेट पर हैं। साथ ही ममता सरकार के 15 वर्षों के व्यवस्था विरोधी कारकों, विशेष कर शिक्षक, नगर पालिक भर्ती से लेकर राशन घोटाले तक को मुद्दा बना रही है। दू
फिलहाल सरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ‘स्थानीय चेहरों’ और विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है, जबकि वाम-कांग्रेस भी इस बार खोई जमीन वापस पाने के लिए अलग-अलग उतर रही है। यदि वाममोर्चा और कांग्रेस मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष वोटों में सेंध लगाता है, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है। 2026 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि ‘ग्रेटर कोलकाता’ की राजनीतिक दिशा तय करने का चुनाव है। यदि भाजपा इस 126 के किले में सेंध लगाती है, तो नवान्न का रास्ता खुल सकता है—वरना ममता बनर्जी का गढ़ एक बार फिर अजेय साबित हो सकता है।










