GK: गरबे का इतिहास कितना पुराना, नवरात्रि से कैसे जुड़ा कनेक्शन? महाराष्ट्र में मुस्लिमों की एंट्री बैन पर विवाद!

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Garba History: महाराष्ट्र में गरबे में मुस्लिमों की एंट्री पर बैन लगाने की गाइडलाइन जारी की गई है. इस पर विवाद छिड़ गया है. जानें गरबे का इतिहास कितना पुराना और नवरात्रि से कैसे जुड़ा कनेक्शन.

विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल ने नवरात्रि के दौरान होने वाले गरबा पंडालों में मुस्लिम्स की एंट्री पर रोक लगाने के इरादे से गाइड लाइन जारी की है. दोनों ही संगठनों का कहना है कि प्रवेश के पहले आधार कार्ड की जांच हो. माथे पर तिलक लगाया जाए. हाथ में कलावा बांधा जाए. महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे ने विहिप की इस मांग का समर्थन किया है. वहीं, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस का कहना है कि अगर कोई शांतिपूर्वक उत्सव देखना चाहते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है.

शिव सेना उद्धव गुट के संजय राऊत, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने इस पर तीखी आपत्ति जताई है. विपक्ष का कहना है कि यह समाज में नफरत फैलाने की कोशिश है. आइए, इस ताजे विवाद के बहाने समझते हैं कि गरबा का इतिहास कितना पुराना है? कैसे इसकी शुरुआत हुई?

गरबा भारत का प्रसिद्ध लोकनृत्य है. इसकी पहचान सबसे अधिक गुजरात से जुड़ी है. नवरात्रि के दिनों में गरबा का आयोजन पूरे उत्साह के साथ किया जाता है. लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं. महिलाएं चनिया-चोली पहनती हैं. पुरुष केडिया और पायजामा पहनते हैं. इसके बाद सभी लोग गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं. गरबा केवल नाच और मनोरंजन का नाम नहीं है. इसके पीछे धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं. गरबा मां शक्ति की उपासना से जुड़ा नृत्य माना जाता है. इसमें जीवन, ऊर्जा और सृजन शक्ति का सम्मान किया जाता है.

गरबा शब्द संस्कृत के शब्द गर्भ से जुड़ा माना जाता है. पुराने समय में मिट्टी के एक घड़े में दीपक रखा जाता था. इस घड़े को कई जगह गर्भ-दीप या गरबो कहा जाता था. घड़े में छोटे-छोटे छेद होते थे. दीपक की रोशनी इन छेदों से बाहर आती थी. यह दीपक जीवन और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता था. घड़ा शरीर का प्रतीक था. उसके अंदर जलता दीपक आत्मा और शक्ति का प्रतीक माना जाता था. इसी दीपक के चारों ओर लोग गोल घेरा बनाकर नृत्य करते थे.

गरबा की शुरुआत गुजरात के गांवों से हुई

इतिहासकारों और लोक परंपराओं के अनुसार, गरबा की शुरुआत गुजरात के गांवों से हुई. गांवों में नवरात्रि के दौरान लोग एक जगह इकट्ठा होते थे. वहां देवी की पूजा की जाती थी. पूजा के बाद महिलाएं और पुरुष तालियों की लय पर नृत्य करते थे. शुरुआत में गरबा बहुत सरल तरीके से किया जाता था. इसमें ढोल, ढोलक, मंजीरा और तालियों का इस्तेमाल होता था. लोग देवी के भजन गाते थे. समय के साथ इसमें अलग-अलग कदम और ताल जुड़ते गए.

कुछ विद्वान गरबा जैसी नृत्य परंपराओं का संबंध प्राचीन लोकनृत्यों से जोड़ते हैं. हरिवंश पुराण में दंड रसक और ताल रसक जैसे नृत्यों का उल्लेख मिलता है. हालांकि, आधुनिक गरबा का वर्तमान रूप धीरे-धीरे गुजरात की लोक संस्कृति में विकसित हुआ. गरबा की परंपरा को सोलंकी और वाघेला काल से जोड़ने वाले मत भी मिलते हैं. इन राजवंशों के समय गुजरात में मंदिरों और लोक परंपराओं का विकास हुआ. इसी दौर में धार्मिक उत्सवों के साथ सामूहिक नृत्य की परंपरा मजबूत हुई.

नवरात्रि से गरबा का क्या है संबंध?

नवरात्रि मां दुर्गा और शक्ति की उपासना का पर्व है. यह पर्व नौ रातों तक मनाया जाता है. इन नौ दिनों में देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है. मान्यता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था. यह घटना बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानी जाती है. गरबा के माध्यम से लोग देवी शक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं. गरबा के बीच में देवी की प्रतिमा या गर्भ-दीप रखा जाता है. लोग उसके चारों ओर घूमते हैं. गोल घेरा जीवन चक्र का प्रतीक माना जाता है. इसका अर्थ जन्म, जीवन और मृत्यु के चक्र से भी जोड़ा जाता है.

गरबा में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है. इसे नारी शक्ति और सृजन क्षमता का सम्मान करने वाला नृत्य माना जाता है. पहले कई स्थानों पर कन्या के जन्म, विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर भी गरबा किया जाता था.

गरबा और डांडिया में क्या है अंतर?

अक्सर गरबा और डांडिया को एक ही समझ लिया जाता है. दोनों गुजरात की लोकप्रिय नृत्य परंपराएं हैं. फिर भी दोनों में अंतर है. गरबा में मुख्य रूप से तालियां, हाथों की मुद्राएं और गोल घेरा बनाया जाता है. इसमें नर्तक दीपक या देवी की प्रतिमा के चारों ओर नृत्य करते हैं. डांडिया में लकड़ी की रंगीन छड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है. लोग एक-दूसरे की छड़ियों से ताल मिलाते हैं. डांडिया की छड़ियों को देवी दुर्गा की तलवार का प्रतीक माना जाता है. आजकल कई आयोजनों में गरबा और डांडिया दोनों एक साथ किए जाते हैं. इनमें पारंपरिक संगीत के साथ फिल्मी गीत और आधुनिक संगीत भी शामिल हो गया है.

गरबा गुजरात से निकलकर देश और दुनिया तक पहुंचा

ज्ञात हो कि, समय के साथ गरबा गुजरात की सीमाओं से बाहर निकल गया. आज महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और देश के कई अन्य हिस्सों में गरबा कार्यक्रम होते हैं. विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय भी नवरात्रि के दौरान गरबा आयोजित करते हैं. अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बड़े गरबा कार्यक्रम देखे जाते हैं. पहले गरबा मुख्य रूप से धार्मिक आयोजन था. अब यह सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम भी बन चुका है. इसमें बड़ी संख्या में युवा हिस्सा लेते हैं. कई जगह गरबा प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं. बड़े शहरों में गरबा अब व्यावसायिक आयोजन का रूप भी ले चुका है. इसके लिए टिकट बेचे जाते हैं. बड़े मैदानों में कार्यक्रम होते हैं. प्रसिद्ध कलाकार और गायक भी इन आयोजनों में शामिल होते हैं.

महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे का वीडियो
#WATCH | Maharashtra | BJP MLA Nitesh Rane says, “…It is the demand of the entire Hindu community that when Navaratri begin and dandia will be played, participants should be from the Hindu community. We have received extensive information that cases of ‘Love Jihad’ and pic.twitter.com/HNGFm05NO9

कानून और सामाजिक सौहार्द का सवाल

वहीं, महाराष्ट्र में शुरू हुए विवाद ने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं. क्या किसी निजी धार्मिक आयोजन में आयोजक अपनी शर्तें तय कर सकते हैं. क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान जांचने के लिए आधार कार्ड और तिलक का इस्तेमाल उचित है. क्या धर्म के आधार पर प्रवेश रोकना संविधान के समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों से मेल खाता है. इन सवालों का अंतिम उत्तर संबंधित कानून और प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर करेगा. केवल किसी संगठन की घोषणा को सरकारी आदेश नहीं माना जा सकता. इसलिए किसी भी सूचना के सामने आने पर यह देखना जरूरी है कि निर्देश किसने जारी किए हैं और प्रशासन ने उस पर क्या रुख अपनाया है? गरबा श्रद्धा, संगीत और सामूहिक उत्सव की परंपरा है. इसके साथ सुरक्षा और अनुशासन जरूरी है. लेकिन सुरक्षा के नाम पर किसी समुदाय के सभी लोगों को संदेह की नजर से देखना सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है.

दरअसल, गरबा की परंपरा कई सदियों पुरानी लोक संस्कृति से जुड़ी है. इसका वर्तमान स्वरूप गुजरात के गांवों में विकसित हुआ. यह नवरात्रि, मां शक्ति और सृजन ऊर्जा को समर्पित नृत्य है. आज गरबा भारत और दुनिया के कई हिस्सों में लोकप्रिय है. इसी वजह से इसे धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक उत्सव भी माना जाता है.

फिलहाल, महाराष्ट्र में मुस्लिमों की एंट्री पर रोक और पहचान जांच को लेकर उठा विवाद केवल गरबा तक सीमित नहीं है. यह धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा मुद्दा बन गया है. गरबा की मूल भावना लोगों को एक साथ जोड़ने की रही है. ऐसे में आयोजकों, प्रशासन और राजनीतिक संगठनों को संवेदनशीलता के साथ फैसला लेना चाहिए. सुरक्षा और धार्मिक आस्था का सम्मान जरूरी है. साथ ही संविधान में दिए गए समानता और भाईचारे के मूल्यों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

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