बकरीद पर क्यों दी जाती है बकरे की कुर्बानी? जानें इसके पीछे क्या है कहानी

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Bakrid Ki Kahani: बकरीद (ईद-उल-अजहा) इंसानियत और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास का त्योहार है. यह पैगंबर इब्राहिम के बलिदान और समर्पण को याद दिलाता है. इस त्योहार पर मुसलमान कुर्बानी देते हैं, जो स्वार्थ त्यागकर अच्छाई अपनाने का प्रतीक है.

Bakrid Par Qurbani: भारत में 28 मई को ईद-उल अजहा का त्योहार मनाया जाएगा. इसे बकरीद के नाम से भी जाना जाता है. बकरीद इस्लामी कैलेंडर के 12वें महीने जिल-हिज्जा की 10 तारीख को मनाई जाती है. यह हज यात्रा के समापन का प्रतीक भी है. बकरीद इस्लाम धर्म के पाक त्योहारों में से एक है. बकरीद के अवसर पर मुसलमान बकरे की कुर्बानी देते हैं. बकरीद पर कुर्बानी के रिवाज की जड़ें इस्लामिक इतिहास से बड़ी गहरी जुड़ी हुई हैं.


वहीं, बकरीद इंसानियत, भाईचारे और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास का त्योहार है. इस त्योहार पर कुर्बानी से मतलब अपने स्वार्थ को छोड़ना है और अच्छाई को अपनाना है. ये दिन कुर्बानी का होता है, तो आइए जानते हैं कि बकरीद पर बकरे की कुर्बानी का रिवाज क्यों है. बकरे की कुर्बानी के पीछे की कहानी क्या है?

क्यों दी जाती है बकरे की कुर्बानी?

दरअसल, इस्लाम धर्म की मान्यताओं की अनुसार, बकरीद पर कुर्बानी देने का रिवाज पैगंबर हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम से जुड़ा है. कहा जाता है कि अल्लाह ने पैगंबर इब्राहीम की आस्था की परीक्षा लेने का मन बनाया. उन्होंने इब्राहिम से कहा कि वे अपने सबसे प्रिय बेटे इस्माईल की कुर्बानी दें. अल्लाह जानते थे कि इब्राहीम अपने बेटे को बहुत प्यार करते हैं.


हालांकि, इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के प्रति अपनी पूरी श्रद्धा और आस्था दिखाई और उनके आदेश को मान लिया. इसके बाद जैसे ही इब्राहीम अपने बेटे की कुर्बानी देने लगे. अल्लाह ने उनकी नियत नीयत को देखकर इस्माईल की जगह एक मेमने (दुम्बा) को भेज दिया और इस कुर्बानी को स्वीकार कर लिया. तभी से बकरीद पर बकरे की कुर्बानी देने का रिवाज शुरू हो गया.


भारत में बकरीद की परंपराएं

फिलहाल, इस पावन त्योहार पर बकरे की नहीं, बकरी, भेड़, ऊंट या बैल की कुर्बानी भी दी सकती है. बकरीद पर कुर्बानी देकर मुसलमान इब्राहिम की नीयत और अल्लाह के प्रति समर्पण को याद करते हैं. भारत में बकरीद पर मुसलमान सुबह ईदगाह या मस्जिद में विशेष नमाज़ पढ़ते हैं. इसके बाद कुर्बानी दी जाती है. फिर रिश्तेदारों व जरूरतमंदों में गोश्त बांटा जाता है. इस मौके पर नए वस्त्र पहनें जाते हैं. मिठाइयां बनती हैं और मेहमानों का स्वागत होता है.

Disclaimer:
इस खबर में दी गई जानकारी इस्लामिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. janjantaksandesh.com इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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