छत्तीसगढ़ में अतिक्रमण को लेकर जंगल में जांच करने पहुंची टीम के साथ ग्रामीणों ने की झूमाझटकी..थाने पहुंचा मामला..पढ़ें पूरी ख़बर

🇮🇳

Chhattisgarh News/गरियाबंद। करका के जंगल में अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई की जांच करने पहुंची वन विभाग की टीम को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा। विभाग के अनुसार करीब 50 से 60 ग्रामीणों ने टीम को सरकारी कार्रवाई से रोकने की कोशिश की, जिसके चलते मौके पर विवाद, धक्का-मुक्की और झूमाझटकी की स्थिति बन गई। हालांकि गनीमत रही कि घटनाक्रम में किसी वन अधिकारी या कर्मचारी के घायल होने की सूचना नहीं है और मामला किसी बड़ी घटना में तब्दील नहीं हुआ।

जंगल का निरीक्षण करने पहुंची टीम, मौके पर गरमाया माहौल

वन विभाग की टीम करका क्षेत्र में कथित अतिक्रमित वनभूमि का निरीक्षण और कार्रवाई के लिए पहुंची थी। विभाग के अनुसार टीम जब कथित अतिक्रमित क्षेत्र की ओर आगे बढ़ी तो बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए और शासकीय कर्मचारियों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने की कोशिश की गई।

वहीं, विभाग का आरोप है कि इस दौरान ग्रामीण मुकेश मरकाम को मौके से ले जाया गया। मुकेश की ओर से पूरी घटना की वीडियोग्राफी किए जाने की बात भी विभाग ने कही है। मामले में वीडियो साक्ष्य के साथ थाना खल्लारी में FIR के लिए आवेदन दिए जाने की जानकारी सामने आई है।


जंगल की जमीन पर कब्जे का आरोप

करका की मौजूदा कार्रवाई को समझने के लिए इसका पुराना इतिहास भी महत्वपूर्ण है। करका कभी एक वन ग्राम था और सोंढूर बांध के कैचमेंट क्षेत्र में तत्कालीन सीतानदी अभयारण्य के अंतर्गत आता था।

सोंढूर बांध के निर्माण के बाद वर्ष 1980 के दशक में करका गांव का विस्थापन किया गया था। उपलब्ध विभागीय अभिलेखों के अनुसार करका के 55 व्यक्तियों को जल संसाधन विभाग द्वारा मुआवजा दिया गया था।

इसके बावजूद वन विभाग के अनुसार बाद में इसी क्षेत्र की ऊंचाई पर स्थित वनभूमि पर फिर अतिक्रमण और वन कटाई की गतिविधियां सामने आईं। यानी गांव को हटाने और मुआवजा देने के दशकों बाद भी जंगल की जमीन को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ।

30 हजार पेड़ों की कटाई का प्रारंभिक अनुमान

ज्ञात हो कि, 22 सितंबर 2026 को किए गए मैदानी निरीक्षण में वन विभाग को 1,100 से ज्यादा पेड़ों पर गर्डलिंग और बड़ी संख्या में कटे हुए पेड़ों के ठूंठ मिले। विभाग के प्रारंभिक आकलन के अनुसार वर्ष 2016 से 2017 के बीच करीब 30 हजार पेड़-पौधे काटे जाने के संकेत मिले हैं।


वहीं GPS आधारित आकलन में लगभग 35 हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण के संकेत मिले हैं। हालांकि विभाग के अनुसार अंतिम क्षेत्रफल का निर्धारण DGPS आधारित ड्रोन मैपिंग पूरी होने के बाद किया जाएगा।

22 हेक्टेयर से शुरू हुआ मामला, अब 35 हेक्टेयर तक जांच

हालांकि वर्ष 2016 में भी करका से जुड़े 22 व्यक्तियों के खिलाफ करीब 22 हेक्टेयर घने वन क्षेत्र में कथित अतिक्रमण को लेकर POR दर्ज किया गया था। विभागीय जानकारी के अनुसार वर्ष 2023 में नगरी न्यायालय ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया था। अब वन विभाग सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन फुटेज, GPS/DGPS मैपिंग और मैदानी साक्ष्यों के आधार पर क्षेत्र की स्थिति का दोबारा आकलन कर रहा है।

जंगल बचाने की कार्रवाई या फिर पुराना विवाद?

वहीं करका का मामला सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र वन्यजीवों और हाथियों के आवागमन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बताया गया है। विभाग के अनुसार जंगल का लगातार क्षरण होने से वन्यजीवों के आवागमन मार्ग प्रभावित हो सकते हैं और भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति बढ़ सकती है।


दरअसल USTR का दावा है कि पिछले चार वर्षों में करीब 1,050 हेक्टेयर अतिक्रमित वनभूमि मुक्त कराई गई है। अब करका में कार्रवाई के दौरान हुआ विवाद इस पुराने अतिक्रमण मामले को फिर चर्चा में ले आया है।

फिलहाल, सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि जंगल में कितने पेड़ कटे और कितनी जमीन पर कब्जा हुआ सवाल यह भी है कि जिस करका को दशकों पहले बांध के लिए मुआवजा देकर विस्थापित किया गया था, उसकी वनभूमि पर दोबारा कब्जे की कहानी आखिर इतनी लंबी कैसे हो गई?

Please Share With Your Friends Also

‘जन-जन तक संदेश’ ( Jan Jan Tak Sandesh) यह छत्तीसगढ़ का एक तेजी से बढ़ता हुआ हिंदी न्यूज़ पोर्टल है। हमारा उद्देश्य सिर्फ खबरें पहुँचाना नहीं, बल्कि समाज की आवाज़ बनना है।

Leave a Comment