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जनरल नॉलेज डेस्क, नई दिल्ली। भारत की ताकत जमीन से कच्चा तेल निकालने में उतनी नहीं, जितनी उसे कुशलता से रिफाइन करके दुनिया की जरूरत के मुताबिक पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करने में है. मॉरीशस के साथ हुआ पांच साल का समझौता इसी बदलती भूमिका का संकेत है.
मेड इन इंडिया पेट्रोल के एक्सपोर्ट का सीक्रेट
भारत को अक्सर दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों में गिना जाता है. देश अपनी जरूरत का करीब 88-90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. रूस और मिडिल ईस्ट तेल खरीदने में हर साल 13 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च आता है. इसका एक दूसरा पहलू भी है. जिस देश के पास अपनी जरूरत के लिए पर्याप्त कच्चा तेल नहीं है, वही देश दुनिया के बड़े पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातकों में शामिल है. भारत के इस बढ़ते पेट्रोलियम कारोबार की ताजा मिसाल मॉरीशस के साथ हुआ समझौता है. आइए जानते हैं भारत जब कच्चे तेल के लिए विदेशों पर निर्भर है, मेड इन इंडिया पेट्रोल-डीजल कैसे बेच पाता है? आखिर क्या है वो सीक्रेट?
मॉरीशस से क्या हुई डील?
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की 21-22 अगस्त की मॉरीशस यात्रा के दौरान इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और मॉरीशस की स्टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन के बीच लॉन्ग टर्म सप्लाई एग्रीमेंट हुआ है. इसके तहत IOC अगले 5 साल तक मॉरीशस की पेट्रोल, डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF की जरूरत पूरी करेगा. ये किसी भारतीय सरकारी तेल कंपनी का दक्षिण एशिया के बाहर हुआ पहला लॉन्ग टर्म फ्यूल सप्लाई समझौता बताया जा रहा है.
कच्चा तेल आयात करके पेट्रोलियम एक्सपोर्ट क्यों?
यहीं से भारत के तेल कारोबार की असली कहानी शुरू होती है. कच्चा तेल सीधे पेट्रोल या डीजल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इसे रिफाइनरी में पहुंचाया जाता है. रिफाइनरी में अलग-अलग प्रक्रियाओं के जरिए कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल, ATF, LPG, नेफ्था और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं.
भारत की रिफाइनिंग कितनी मजबूत?
भारत के पास कच्चे तेल के बड़े भंडार भले ही सीमित हों, लेकिन उसकी रिफाइनिंग क्षमता बेहद मजबूत है. पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 1 अप्रैल 2026 तक देश की कुल रिफाइनिंग क्षमता 26.71 करोड़ टन सालाना पहुंच चुकी थी. 2014 में यह क्षमता करीब 21.50 करोड़ टन थी. यानी करीब 12 वर्षों में इसमें 24 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. यही क्षमता यही क्षमता भारत को सिर्फ तेल आयातक नहीं रहने देती, बल्कि उसे रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी बनाती है.
भारत के पास दुनिया में चौथे नंबर की रिफाइनिंग ताकत
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश है, जहां सबसे ज्यादा रिफाइनिंग क्षमता है. देश में सरकारी और निजी क्षेत्र की कुल 24 प्रमुख रिफाइनरियां हैं. ये रोजाना करीब 56 लाख बैरल कच्चे तेल को रिफाइन कर सकती हैं. रिलायंस इंडस्ट्रीज, नायरा एनर्जी और HPCL-मित्तल एनर्जी जैसी कंपनियां भी देश की रिफाइनिंग क्षमता में बड़ा योगदान देती हैं. गुजरात के जामनगर में मौजूद रिलायंस की रिफाइनरी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यहां दो रिफाइनरियां हैं.कंपनी के मुताबिक जामनगर परिसर में रोजाना 12.4 लाख बैरल तक तेल रिफाइन किया जा सकता है.
कितना है भारत का तेल कारोबार?
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों को मिलाकर कुल 29.19 करोड़ टन का आयात किया. इसी दौरान 6.14 करोड़ टन का निर्यात भी किया गया. इस तरह भारत का नेट इंपोर्ट करीब 23.05 करोड़ टन रहा. इसका मतलब साफ है कि भारत जितना तेल बाहर से खरीदता है, उसका बड़ा हिस्सा देश की रिफाइनरियों में पहुंचता है. वहां कच्चे तेल को ज्यादा उपयोगी और मूल्यवान उत्पादों में बदला जाता है. फिर इन उत्पादों को घरेलू बाजार के साथ-साथ विदेशों में भी बेचा जाता है.
किन देशों को मेड इन इंडिया पेट्रोल और डीजल बेचता है भारत?
PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, नीदरलैंड्स भारत के पेट्रोलियम उत्पादों का सबसे बड़ा निर्यातक देश है. 2025 में इसकी हिस्सेदारी करीब 21% रही. भारत इसके साथ ही UAE, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्राजील को डीजल निर्यात करता है. भारत दक्षिण एशिया के देशों के अलावा अफ्रीका और यूरोप के बाजारों में भी पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है.
एक बैरल तेल से क्या-क्या निकलता है?
कच्चे तेल की कीमत सिर्फ इसलिए नहीं होती कि उससे पेट्रोल बनता है. रिफाइनरी में एक बैरल कच्चे तेल को अलग-अलग उत्पादों में बदला जाता है. एक अनुमान के मुताबिक एक बैरल कच्चे तेल से करीब 35.8 फीसदी पेट्रोल, 25.9 फीसदी डीजल, 4.7 फीसदी जेट फ्यूल और कई अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पाद प्राप्त किए जा सकते हैं. यानी भारत का फायदा सिर्फ तेल खरीदने और बेचने में नहीं, बल्कि कच्चे तेल को ज्यादा मूल्य वाले उत्पादों में बदलने की क्षमता में है.
2030 तक और बढ़ेगी ताकत
भारत अब अपनी रिफाइनिंग क्षमता को और बढ़ाने की तैयारी में है. मौजूदा करीब 26.71 करोड़ टन सालाना क्षमता को 2030 तक लगभग 31 करोड़ टन तक पहुंचाने का लक्ष्य है. इसका सीधा असर भारत के ऊर्जा कारोबार पर पड़ सकता है. ज्यादा रिफाइनिंग क्षमता का मतलब है कि देश ज्यादा कच्चा तेल प्रोसेस कर सकता है. घरेलू मांग पूरी कर सकता है. बाजार की स्थिति अनुकूल होने पर ज्यादा पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी कर सकता है.


















