🇮🇳
नई दिल्ली। पटाखे अलग-अलग रंगों की रोशनी बिखेरते हैं. ये रोशनी उन्हें खास तरह के केमिकल्स मिलती है. जैसे- लाल रंग के लिए स्ट्रॉन्शियम और हरे रंग के लिए बेरियम. जानें, पटाखों के रंगों का साइंस.
दिवाली की रात आसमान में जब पटाखे फूटते हैं तो लाल, हरी, नीली और सुनहरी रोशनी बिखर जाती है. लेकिन ये रंग आखिर आते कहां से हैं? रंग कोई जादू नहीं है, इसका जवाब केमिस्ट्री में छिपा है. हर तत्व के परमाणु में इलेक्ट्रॉन अलग-अलग ऊर्जा स्तरों पर रहते हैं. पटाखे के जलने से बहुत तेज गर्मी पैदा होती है. इस गर्मी से इलेक्ट्रॉन ऊर्जा सोखकर ऊंचे स्तर पर पहुंच जाते हैं. लेकिन वे वहां टिक नहीं पाते और वापस अपने मूल स्तर पर लौटते हैं। लौटते समय वे ऊर्जा को प्रकाश के रूप में छोड़ देते हैं.
हर तत्व से एक खास तरंगदैर्ध्य का प्रकाश निकलता है, और वही उसका रंग बन जाता है. स्कूल की प्रयोगशाला में होने वाला फ्लेम टेस्ट भी इसी सिद्धांत पर काम करता है. पटाखे उसी का बड़ा और शानदार रूप हैं.
कौन-सा रंग, किस केमिकल से निकलता है?
लाल: स्ट्रॉन्शियम के यौगिक, जैसे स्ट्रॉन्शियम कार्बोनेट या क्लोराइड. यह सबसे लोकप्रिय और चमकदार रंगों में से एक है.
हरा: बेरियम के यौगिक, जैसे बेरियम क्लोराइड या नाइट्रेट.
नीला: कॉपर यानी तांबे के यौगिक, खासकर कॉपर क्लोराइड.
पीला: सोडियम के यौगिक. सोडियम की रोशनी इतनी तेज होती है कि वह दूसरे रंगों को दबा सकती है.
नारंगी: कैल्शियम के यौगिक.
बैंगनी: स्ट्रॉन्शियम (लाल) और कॉपर (नीला) का मिश्रण.
सफेद और चांदी जैसी चमक: एल्युमिनियम, मैग्नीशियम या टाइटेनियम जैसी धातुओं का चूरा.
सुनहरी चिंगारियां: लोहे का चूरा या चारकोल.

Fireworks
पटाखों के रंगों के पीछे अलग-अलग केमिकल होते हैं.
नीला रंग बनाना सबसे मुश्किल क्यों?
पटाखा बनाने वालों के लिए गहरा नीला रंग हमेशा से चुनौती रहा है. कॉपर वाला नीला रंग सिर्फ एक सीमित तापमान दायरे में, करीब 1200 डिग्री सेल्सियस के आसपास, ठीक से दिखता है. तापमान ज्यादा हुआ तो यौगिक टूट जाता है और रंग फीका पड़ जाता है. कम हुआ तो रोशनी इतनी कमजोर होती है कि आसमान में दिखती ही नहीं. इसलिए आतिशबाजी के शो में साफ और गहरा नीला रंग निकालना कला और विज्ञान दोनों की परीक्षा माना जाता है.

Fireworks Science
एक पटाखे में कई तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है।
सिर्फ रंग से काम नहीं चलता
पटाखे में रंग देने वाले रसायन अकेले नहीं होते, उनके साथ ये चीजें भी जरूरी हैं.
ऑक्सीडाइजर: जैसे पोटैशियम नाइट्रेट. ये जलने के लिए ऑक्सीजन देते हैं और तेज गर्मी पैदा करते हैं.
ईंधन: जैसे चारकोल या सल्फर, जो मिश्रण को जलाए रखते हैं.
बाइंडर: जो सारे पदार्थों को एक साथ जोड़कर रखता है.
क्लोरीन देने वाले पदार्थ: कई चमकीले रंगों के लिए धातु का क्लोराइड बनना जरूरी होता है, जिससे रंग गहरा और साफ दिखता है.
आसमान में दिखने वाली गोल आकृतियां और अलग-अलग पैटर्न रंग वाले छोटे-छोटे दानों, जिन्हें “स्टार” कहा जाता है, को खास तरीके से भरकर बनाए जाते हैं. धमाके के साथ ये स्टार सब दिशाओं में बिखरते हैं और गोला बन जाता है.
रंगों की कीमत, सेहत और पर्यावरण
इन रंगों का एक स्याह पहलू भी है. बेरियम जैसे कई यौगिक सेहत के लिए हानिकारक हो सकते हैं और भारी धातुओं के कण हवा में मिलकर प्रदूषण बढ़ाते हैं. दिवाली के आसपास कई शहरों में हवा की गुणवत्ता खराब होने की एक वजह यह भी है. अस्थमा या सांस की समस्या वाले लोगों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह खास तौर पर नुकसानदेह हो सकता है.
इसी वजह से वैज्ञानिक कम धुएं और कम हानिकारक रसायनों वाले विकल्पों पर काम कर रहे हैं(. भारत में भी कम प्रदूषण वाले “ग्रीन क्रैकर्स” की चर्चा होती रही है, जिनमें हानिकारक रसायनों की मात्रा घटाने की कोशिश की जाती है. हालांकि इनके नियम और उपलब्धता राज्य और शहर के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए पटाखे जलाने से पहले अपने क्षेत्र के नियम जरूर जान लें.


















