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Chanakya Niti: बच्चों को लेकर हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर हर मुश्किल का सामना खुद कर सके. लेकिन इसके लिए सिर्फ अच्छी पढ़ाई और बेहतर फैसिलिटीज देना काफी नहीं है. बचपन में कुछ छोटी-छोटी बातें सिखाना भी उतना ही जरूरी है. चलिए इन बातों के बारे में विस्तार से जानते हैं.
Chanakya Niti: बच्चे जब छोटे होते हैं, तो माता-पिता की सबसे ज्यादा कोशिश यही रहती है कि उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो. चाहे स्कूल का काम हो, दोस्तों से कोई बात हो या घर के बाहर कोई छोटा-मोटा काम, हम तुरंत उनकी मदद के लिए आगे आ जाते हैं. मेरे एक जानने वाले की भी यही आदत थी. उनका बेटा जब भी किसी छोटी परेशानी में फंसता, वह बिना उसकी बात पूरी सुने ही उसका काम कर देते थे. एक दिन उन्हें खुद यह अहसास होने लगा कि अब बच्चा हर छोटी बात के लिए उनकी तरफ देखने लगा है.
यहीं से एक जरूरी बात समझ आती है. बच्चों को हर परेशानी से बचाना जितना जरूरी लगता है, उतना ही जरूरी उन्हें धीरे-धीरे अपनी परेशानियां हैंडल करना सिखाना भी है. हर माता-पिता को यह बात समझनी होगी कि बच्चे हमेशा उनके साथ नहीं रहेंगे. बड़े होने पर उन्हें पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और पैसों से जुड़ी कई मुश्किलों का सामना खुद करना होगा. ऐसे में बचपन से मिली कुछ अच्छी सीख उनके बहुत काम आ सकती है. आचार्य चाणक्य ने भी बच्चों की परवरिश और उनके व्यवहार को लेकर कई ऐसी बातें बताई हैं, जिनका मतलब आज की जिंदगी में भी पूरी तरह समझ आता है.
अगर आपके बच्चे भी अभी छोटे हैं और आप उनका फ्यूचर बेहतर और इंडिपेंडेंट बनाना चाहते हैं, तो आपको इस आर्टिकल को लास्ट तक जरूर पढ़ना चाहिए. आज हम आपको ऐसी ही कुछ जरूरी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें आपको अपने बच्चों को जितनी जल्दी हो सके सिखा देना चाहिए.
अपने छोटे-छोटे काम खुद करना सीखें
बच्चे को छोटी उम्र से ही अपने छोटे-छोटे काम खुद करने की आदत डालनी चाहिए. उदाहरण के लिए, अपना स्कूल बैग खुद पैक करना, खेलने के बाद खिलौने सही जगह पर रखना और अपनी चीजों को संभालकर रखना. शुरुआत में इन कामों में उसे थोड़ी मदद की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन हर बार माता-पिता को उसका काम खुद नहीं कर देना चाहिए. चाणक्य की नीतियों में आत्मनिर्भर बनने की बात को काफी महत्व दिया गया है. इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चे को उसकी परेशानी में अकेला छोड़ दिया जाए, बल्कि जब वह खुद किसी काम को करने की कोशिश करे, तो माता-पिता उसे सही तरीका समझाएं और जरूरत पड़ने पर मदद करें. इससे बच्चे के अंदर धीरे-धीरे यह भरोसा पैदा होता है कि वह अपनी छोटी-बड़ी जिम्मेदारियां खुद भी संभाल सकता है.
गलती होने पर डरने के बजाय उससे सीखें
बच्चों से गलती होना बिल्कुल नॉर्मल सी बात है. कभी एग्जाम में कम नंबर आ सकते हैं, कभी खेलते समय कोई चीज टूट सकती है और कभी दोस्तों के साथ किसी बात पर झगड़ा भी हो सकता है. ऐसे समय पर अगर माता-पिता हर गलती के लिए बच्चे को डांटेंगे, तो वह अगली बार अपनी गलती छिपाने की कोशिश कर सकता है. इसलिए बच्चे को समझाएं कि गलती हो जाने के बाद सबसे जरूरी बात यह देखना है कि उसे दोबारा कैसे न दोहराया जाए. अगर उसने किसी का सामान तोड़ दिया है, तो उसे माफी मांगने और उसे ठीक करने की जिम्मेदारी लेने दें. इस तरह बच्चा धीरे-धीरे अपनी गलती एक्सेप्ट करना और उससे सीखना सीख जाता है. आगे चलकर यही आदत उसे मुश्किल समय में घबराने के बजाय हालात को समझकर सही कदम उठाने में मदद कर सकती है.
हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं होती
आज के समय में बच्चों की कई इच्छाएं बहुत जल्दी पूरी हो जाती हैं. उन्हें कोई खिलौना पसंद आया, तो कुछ ही समय में माता-पिता उसे खरीदकर घर ले आते हैं. उन्हें बाहर का खाना खाना है, तो इंस्टेंट ऑर्डर किया जा सकता है. ऐसे माहौल में बच्चे के लिए इंतजार करना और अपनी इच्छा पर थोड़ा काबू रखना सीखना भी जरूरी है. अपने बच्चों को इंतजार करना सिखाने के लिए माता-पिता छोटी-छोटी बातों से यह आदत डाल सकते हैं. अगर बच्चे को कोई खिलौना चाहिए, तो उसे तुरंत खरीदने के बजाय कुछ दिन इंतजार करने को कहा जा सकता है. इससे बच्चा समझता है कि हर चीज उसी समय मिलना जरूरी नहीं है. आगे चलकर यही आदत उसे पेशेंस रखने और जल्दबाजी में फैसले लेने से बचने में मदद कर सकती है.
हर किसी पर आंख बंद करके भरोसा न करें
बच्चों को दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना जरूर सिखाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही उन्हें यह समझाना भी जरूरी है कि हर किसी पर आंख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता. खासकर अनजान लोगों के साथ अपनी पर्सनल जानकारी शेयर न करना और किसी की बात पर बिना सोचे-समझे भरोसा न करना जैसी बातें उन्हें छोटी उम्र से ही सिखाई जा सकती हैं. बच्चे को यह भी समझाएं कि अगर कोई व्यक्ति उसे ऐसी बात करने को कहे जिससे वह अनकंफर्टेबल महसूस कर रहा हो, तो उसे तुरंत अपने पेरेंट्स या किसी भरोसेमंद को बताना चाहिए. चाणक्य नीति में भी सही लोगों की संगति और लोगों को परखने की बात पर जोर दिया गया है. यह सीख आज के समय में बच्चों की सेफ्टी और सही समझ के लिए काफी काम आ सकती है.
परेशानी आने पर पहले सोचें, फिर फैसला लें
जब बच्चा किसी परेशानी में फंसता है, तो माता-पिता का तुरंत उसका सॉल्यूशन बता देना सबसे आसान रास्ता लगता है. लेकिन अगर हर छोटी प्रॉब्लम का हल माता-पिता ही बताएंगे, तो बच्चे को खुद सोचकर रास्ता निकालने का मौका कम मिलेगा. ऐसे समय पर आप उससे पूछ सकते हैं, “तुम्हें क्या लगता है, इसे कैसे ठीक किया जा सकता है?” उसकी बात ध्यान से सुनें और फिर जरूरत के हिसाब से सही दिशा दिखाएं. अगर बच्चे को खुद सॉल्यूशन सोचने का मौका मिलेगा, तो धीरे-धीरे उसके अंदर मुश्किल हालात को समझने और फैसला लेने का भरोसा बढ़ेगा. इससे आगे चलकर पढ़ाई, नौकरी या जिंदगी की किसी बड़ी परेशानी में यही आदत उसके बहुत काम आ सकती है.


















