General Knowledge : सूखा, लू या बाढ़,”अल-नीनो” का भारत के किन राज्यों पर ज्यादा खतरा, देश के किसानों के लिए कैसे बढ़ेंगी मुश्किलें? आसान भाषा में समझें

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El Nino Impact On India: प्रचंड गर्मी के बीच दुनियाभर में अल-नीनाे की चर्चा है. एक बात साफ है कि दुनियाभर में इसका असर दिखेगा. भारत भी इससे बच नहीं पाएगा. विश्व मौसम विज्ञान संगठन का कहना है कि इसका असर अगस्त से नवंबर के बीच दिखेगा. जानिए, अल-नीनो कैसे असर दिखाएगा, देश के किस हिस्से में इसका असर होगा और देश के किसानों के लिए कैसे मुश्किलें बढ़ सकती हैं.


अल-नीनो सक्रिय हो गया है. इसका सीधा असर दुनिया भर में होने वाला है. भारत भी इससे बच नहीं पाएगा. इसे रोकने का कोई उपाय किसी भी देश के पास नहीं है. केवल सावधानी ही बचाव का सर्वोत्तम उपाय है. यह जो भी करेगा, उत्पात के लेवल पर करेगा. मतलब बारिश होगी तो झूम कर होगी. नहीं होगी तो नहीं होगी. मतलब साफ है कि गर्मी खूब पड़ेगी. अल-नीनो का असर अगस्त से नवंबर तक रहने की संभावना विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने की है. भारत में जून से सितंबर तक किसान को फसल के लिए ज्यादा मानसूनी बारिश की जरूरत होती है. ऐसे में जहां वर्षा होगी वहां तो ठीक जहां नहीं होगी या कम होगी, वहां फसलों को नुकसान होगा. सबसे ज्यादा चिंता मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और पश्चिमी भारत को लेकर है. इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल हो सकते हैं.




भारत के बड़े हिस्से में सूखे जैसे हालात बनने की आशंका जताई जा रही है, लेकिन इसे अभी देशव्यापी सूखा कहना ठीक नहीं होगा. सूखा घोषित करना सरकार और मौसम एजेंसियों की तय प्रक्रिया से होता है. इसके लिए बारिश की कमी, फसल की हालत, मिट्टी की नमी, जलाशयों का स्तर और भूजल जैसे कई संकेत देखे जाते हैं. तब जाकर सूखे की घोषणा होती है. फिलहाल, चिंता इसलिए बढ़ी है, क्योंकि मानसून सामान्य के कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं.

बारिश के बंटवारे को लेकर चिंता में मौसम विज्ञानी
भारत मौसम विज्ञान विभाग ने जून से सितंबर 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अद्यतन दीर्घावधि पूर्वानुमान जारी किया है. मौसम विभाग की ओर से जारी ताजी सूचना के मुताबिक मानसून आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कुछ और हिस्सों तक बढ़ा है, फिर भी बारिश के कुल बंटवारे को लेकर चिंता बनी हुई है.

आशंका का सबसे बड़ा कारण क्या है?

इस चिंता का मुख्य कारण अल-नीनो है. अल-नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है. इसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है. इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है. अल-नीनो बनने पर भारतीय मानसून कमजोर पड़ सकता है. ऐसा हर बार नहीं होता, लेकिन जोखिम बढ़ जाता है.

भारतीय मानसून समुद्र से नमी खींचकर जमीन पर बारिश लाता है. अल-नीनो इस नमी और हवा के प्रवाह को बदल देता है. इससे बादल कम बनते हैं. बारिश के बीच लंबे अंतराल आ सकते हैं. कुछ इलाकों में लंबे ड्राई स्पेल बन सकते हैं. अमेरिका की आधिकारिक एजेंसी NOAA के क्लाइमेट प्रीडिक्शन सेंटर ने 11 जून 2026 को अल-नीनो से जुड़ी एडवाइजरी जारी की है. उसके अनुसार अल-नीनो की स्थितियां मौजूद हैं. अल-नीनो के प्रभाव वाले समुद्र क्षेत्र में सतह का तापमान सामान्य से लगभग 0.7 डिग्री से अधिक बताया है.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी दी चेतावनी

विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी चेतावनी दी है. संगठन ने बीते 2 जून को कहा कि गर्म समुद्री पानी अल-नीनो को बढ़ा रहा है. जून से अगस्त 2026 के बीच अल-नीनो बनने की संभावना 80 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है. नवंबर तक इसके बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत या उससे अधिक बताई गई है. इसी वजह से संगठन ने चेतावनी दी है कि अल-नीनो वैश्विक तापमान बढ़ा सकता है. इसका असर सूखे, भारी बारिश और हीटवेव के रूप में देखने को मिल सकता है. संगठन ने यह भी कहा कि दक्षिण एशिया में 2026 के मानसून में सामान्य से कम बारिश की आशंका है. संकेत मध्य क्षेत्रों में अधिक मजबूत हैं.

भारत में कौन से क्षेत्र ज्यादा जोखिम में हैं?

बता दें कि, सबसे ज्यादा चिंता मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और पश्चिमी भारत को लेकर है. इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल हो सकते हैं. बारिश आधारित खेती वाले इलाके अधिक संवेदनशील हैं. मध्य भारत को मानसून का कोर जोन माना जाता है. यहां से देश की बड़ी खरीफ खेती जुड़ी है. अगर यहां बारिश कम हुई, तो फसल, चारा, भूजल और जलाशयों पर असर पड़ेगा. धान, दाल, मक्का, सोयाबीन, कपास और मूंगफली जैसी फसलें प्रभावित हो सकती हैं. मौसम विभाग के पूर्वानुमान पर आधारित रिपोर्ट भी इशारा करते हैं कि इस बार कुल मानसूनी बारिश सामान्य से कम रह सकती है. ऐसा हुआ तो फसलों को नुकसान तय है.


मौसम में क्या बदलाव दिख रहा है?

ज्ञात हो कि, सूखे की चर्चा अचानक शुरू नहीं हुई है. इसके पीछे कई संकेत हैं. पहला संकेत समुद्र से आया है. प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ रहा है. अमेरिकी एजेंसी ने अल-नीनो की पुष्टि की है. दूसरा संकेत मानसून के पूर्वानुमान से जुड़ा है. दक्षिण एशिया में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी यही संकेत दिया है. संगठन ने जून से अगस्त के लिए दुनिया के अधिकतर हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान की संभावना जताई है. ज्यादा गर्मी मिट्टी की नमी को जल्दी सुखाती है. इससे फसल पर दबाव बढ़ता है. चौथा संकेत भारत के भीतर दिखता है. जून में उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कई हिस्सों में गर्मी और लू की स्थिति बनी रही.

क्या सिर्फ कम बारिश ही सूखे का कारण है?

हालांकि, सूखा केवल कम बारिश से नहीं बनता. बारिश का समय से होना भी बहुत जरूरी है. अगर जून में अच्छी बारिश हो और जुलाई-अगस्त में लंबा ब्रेक आ जाए, तो खेती प्रभावित हो सकती है. अगर बारिश बहुत तेज हो लेकिन कम दिनों में हो, तो पानी बह जाता है. मिट्टी में नमी नहीं टिकती, इसलिए बारिश का बंटवारा अहम है. किसान के लिए यह जानना जरूरी है कि बारिश कब आएगी और कितने दिन तक टिकेगी. कुल बारिश सामान्य के करीब हो, फिर भी गलत समय पर बारिश से नुकसान हो सकता है.

अल-नीनो और जलवायु परिवर्तन का मेल

वहीं, अल-नीनो प्राकृतिक घटना है. यह पहले भी आता रहा है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन से अल-नीनो की संख्या बढ़ने का सीधा प्रमाण नहीं है, लेकिन गर्म होती धरती इसके असर को गंभीर बना सकती है. गर्म हवा अधिक नमी और ऊर्जा संभालती है. इससे कहीं सूखा लंबा हो सकता है. कहीं अचानक भारी बारिश हो सकती है. यानी खतरा दोहरा है. एक तरफ बारिश कम हो सकती है. दूसरी तरफ मौसम ज्यादा चरम हो सकता है.



किसानों और सरकार के लिए संदेश

दरअसल, ऐसे समय में तैयारी बहुत जरूरी है. किसानों को स्थानीय कृषि मौसम सलाह पर ध्यान देना चाहिए. कम पानी वाली फसलों और सूखा-सहनीय बीजों पर विचार करना चाहिए. खेतों में नमी बचाने के उपाय जरूरी हैं. वर्षा जल संग्रहण भी जरूरी है. सरकारों को जिला स्तर पर तैयारी करनी होगी. बीज, सिंचाई, चारा, पेयजल और फसल बीमा की व्यवस्था समय पर करनी होगी. मौसम चेतावनी को गांव तक जल्दी पहुंचाना होगा.

फिलहाल, कहा जा सकता है कि भारत के बड़े हिस्से में सूखे जैसे हालात बनने की आशंका है. यह आशंका मुख्य रूप से अल-नीनो के कारण है. प्रशांत महासागर का गर्म होना मानसून को कमजोर कर सकता है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन, अमेरिकी एजेंसी, भारतीय मौसम विभाग से जुड़े संकेत बताते हैं कि 2026 का मानसून चुनौतीपूर्ण हो सकता है. फिर भी तस्वीर पूरी तरह तय नहीं है. मानसून हर महीने बदलता है. कुछ इलाकों में अच्छी बारिश भी हो सकती है, इसलिए डरने से ज्यादा जरूरी है तैयारी. समय पर चेतावनी, पानी का बचाव और फसल योजना ही सबसे बड़ा बचाव है.

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