GK: मौसम विभाग को पहले ही कैसे पता चल जाता है बारिश होने वाली है? आइए जानें

👇

How IMD Work: मौसम विभाग को बारिश का पता कैसे चलता है? जानिए रडार, सैटेलाइट, मौसम गुब्बारों और डेटा की मदद से IMD कैसे पहले ही बारिश और मानसून का अनुमान लगाता है.

मौसम विभाग को पहले कैसे मिल जाता है संकेत? मुंबई में सीजन की पहली अच्छी बारिश ने लोगों को राहत दी है. अब मौसम विभाग ने दिल्ली-एनसीआर, यूपी, बिहार और झारखंड के लिए भी बारिश और तेज हवाओं का अलर्ट जारी किया है. दिलचस्प बात यह है कि कई जगहों पर अभी आसमान साफ दिख रहा है और धूप भी तेज है. ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठता है कि मौसम विभाग को पहले से कैसे पता चल जाता है कि बारिश आने वाली है. इसके पीछे कई वैज्ञानिक तरीके और आधुनिक तकनीकें काम करती हैं.


कौन-कौन सा डेटा जुटाया जाता है?

मौसम विभाग केवल बादलों को देखकर भविष्यवाणी नहीं करता. इसके लिए तापमान, हवा की दिशा, हवा की रफ्तार, नमी और वायुदाब जैसी कई चीजों का लगातार रिकॉर्ड रखा जाता है. देश और दुनिया में हजारों मौसम स्टेशन हर कुछ मिनट में डेटा भेजते हैं. भारत में भी सैकड़ों मौसम केंद्र लगातार जानकारी जुटाते हैं. इस डेटा को कंप्यूटर मॉडल में डाला जाता है, जिससे अगले कुछ घंटों और दिनों के मौसम का अनुमान लगाया जाता है. यही जानकारी किसानों, यात्रियों और आम लोगों के काम आती है.

मौसमी गुब्बारे और समुद्र कैसे बताते हैं बारिश का हाल?

हर दिन मौसम विभाग विशेष गुब्बारे आसमान में भेजता है. इन गुब्बारों के साथ एक छोटा उपकरण लगा होता है जो ऊंचाई पर जाकर तापमान, नमी और हवा की जानकारी भेजता है. इसके अलावा समुद्र पर भी लगातार नजर रखी जाती है. समुद्री पानी का तापमान, लहरों की स्थिति और हवाओं का व्यवहार मानसून की चाल तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. समुद्र में तैरने वाले विशेष उपकरण भी लगातार जानकारी भेजते रहते हैं, जिससे मौसम वैज्ञानिकों को सटीक तस्वीर मिलती है.


मौसम विभाग की मदद कैसे करते हैं?

बहुत कम लोगों को पता है कि दुनिया भर में उड़ने वाले हजारों यात्री विमान भी मौसम की जानकारी जुटाने में मदद करते हैं. उड़ान के दौरान विमान ऊपरी वायुमंडल का तापमान, नमी और हवाओं की स्थिति रिकॉर्ड करते हैं. यह जानकारी सीधे मौसम एजेंसियों तक पहुंचती है. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि ऊपर के स्तर पर मौसम कैसे बदल रहा है. कई बार यही डेटा आने वाले तूफान, बारिश या तेज हवाओं की पहले से जानकारी देने में काम आता है.

डॉप्लर रडार कैसे बताता है कि कब बरसेंगे बादल?

बारिश का सबसे अहम अंदाजा डॉप्लर वेदर रडार से लगाया जाता है. यह तकनीक बादलों के अंदर तक झांक सकती है. रडार रेडियो तरंगें भेजता है जो बादलों में मौजूद पानी की बूंदों और बर्फ से टकराकर वापस लौटती हैं. इन संकेतों को पढ़कर वैज्ञानिक समझते हैं कि बादल कितने घने हैं, किस दिशा में जा रहे हैं और कितनी बारिश कर सकते हैं. यही वजह है कि कई बार मौसम विभाग घंटों पहले बारिश का अलर्ट जारी कर देता है.

सैटेलाइट और नमी से कैसे पता चलता है कि बारिश होगी?

मौसम सैटेलाइट लगातार पूरी धरती की तस्वीरें भेजते रहते हैं. इनके जरिए मानसून की चाल, बादलों की स्थिति, समुद्री तापमान और चक्रवात जैसी गतिविधियों पर नजर रखी जाती है. जब तापमान ज्यादा होता है तो गर्म हवा ऊपर उठती है और अपने साथ नमी भी ले जाती है. यही नमी बादलों में बदलती है. अगर हवा में नमी का स्तर 70 से 80 प्रतिशत या उससे ज्यादा हो जाए और हवाएं आपस में टकराएं, तो बारिश की संभावना काफी बढ़ जाती है.

कई बार मौसम की भविष्यवाणी गलत क्यों हो जाती है?

इतनी आधुनिक तकनीक होने के बावजूद मौसम का अनुमान हमेशा 100 प्रतिशत सही नहीं होता. मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है, जहां छोटे बदलाव भी बड़े असर डाल सकते हैं. कभी-कभी पर्याप्त डेटा नहीं मिल पाता या अचानक हवा की दिशा बदल जाती है. ऐसे में कंप्यूटर मॉडल का अनुमान बदल सकता है. कई बार स्थानीय स्तर पर मौसम तेजी से बदल जाता है, जिससे भविष्यवाणी प्रभावित होती है. यही कारण है कि मौसम विभाग लगातार नए डेटा के आधार पर अपने अपडेट और अलर्ट जारी करता रहता है.

Please Share With Your Friends Also

‘जन-जन तक संदेश’ ( Jan Jan Tak Sandesh) यह छत्तीसगढ़ का एक तेजी से बढ़ता हुआ हिंदी न्यूज़ पोर्टल है। हमारा उद्देश्य सिर्फ खबरें पहुँचाना नहीं, बल्कि समाज की आवाज़ बनना है।

Leave a Comment