🇮🇳
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के गया जिले को पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए पवित्र स्थान माना गया है। पितृ पक्ष के दौरान गया में बड़ी संख्या में लोग आकर अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गया की भूमि पर पूर्वजों का पिंडदान करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और पितृ दोष की समस्या से छुटकारा मिलता है।
गया में विष्णुपद मंदिर है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर में भगवान विष्णु के चरण चिह्न हैं। ऐसा माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर में पिंडदान करने से पितर सीधे विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं और जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा मिलता है। क्या आप जानते हैं कि गया पितृ मोक्ष तीर्थ कैसे बना? अगर नहीं पता, तो आइए इस आर्टिकल में आपको इसके बारे में बताते हैं।
गयासुर से जुड़ी कथा का वर्णन वायु पुराण में मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, गयासुर नाम का एक असुर था। उसने तपस्या के द्वारा ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया था। ब्रह्मा जी ने असुर को एक वरदान दिया था, जिससे बिहार का गया सबसे बड़ा और पवित्र पितृ मोक्ष तीर्थ बन गया।
गयासुर का तप और ब्रह्मा जी का वरदान
एक बार गयासुर ने लंबे समय तक तपस्या की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। गयासुर ने वरदान मांगा कि जो भी व्यक्ति मुझे देख ले, उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं और उसे देवलोक की प्राप्ति हो। इस वरदान के कारण यमलोक खाली होने लगा। इस स्थिति को देखकर सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।
ब्रह्मा जी ने गयासुर से कहा कि उन्हें एक पवित्र यज्ञ करना है और यज्ञ के लिए गयासुर के विशाल शरीर से अधिक पवित्र कोई स्थान नहीं है। इसके लिए गयासुर तैयार हो गया। गयासुर के शरीर पर यज्ञ की वेदी बनाई गई और यज्ञ प्रारंभ हुआ।
जब यज्ञ का समापन हुआ, तो उसके बाद भी गयासुर का शरीर हिलने लगा। इसके बाद भगवान विष्णु गदाधर रूप में प्रकट हुए और गयासुर की पीठ पर सभी देवता एवं भगवान विष्णु स्थापित हो गए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि उस असुर के शरीर को स्थिर करने के लिए उसकी पीठ पर एक शिला को भी रखा गया था। इस शिला को आज के समय में प्रेत शिला के नाम से जाना जाता है। गयासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि अब से यह स्थान गया के नाम से जाना जाएगा।


















