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Science News: यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के एक रिसर्च में वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि मेंढक के शरीर में पाया जाने वाला एक प्रोटीन सैक्सिटॉक्सिन जैसे खतरनाक जहर को बेअसर कर सकता है और इंसानों के जान को बचा सकता है.
समुद्र में बढ़ रहा है खतरनाक टॉक्सिन
जानकारी के अनुसार, दुनिया के कई समुद्री इलाकों में रेड टाइड नाम की एल्गल ब्लूम की घटनाएं पहले से ज्यादा देखने को मिल रही हैं.इस दौरान पानी में सैक्सिटॉक्सिन (STX) नाम का खतरनाक टॉक्सिन बनता है यह टॉक्सिन शेलफिश जैसे सीप और दूसरे समुद्री जीवों में जमा हो जाता है. अगर कोई इंसान ऐसी शेलफिश खा ले, तो उसे पैरालिटिक शेलफिश पॉइजनिंग (PSP) हो सकती है यह बीमारी शरीर को तेजी से लकवा मार सकती है और गंभीर हालत में जान का खतरा भी पैदा कर सकती है.
अब तक नहीं था इस टॉक्सिन का इलाज
बता दें कि, सैक्सिटॉक्सिन दुनिया के सबसे ताकतवर न्यूरोटॉक्सिन में गिना जाता है. यह शरीर की नसों के काम को रोक देता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत और लकवा जैसी स्थिति बन सकती है. सबसे बड़ी चिंता यह रही कि अब तक इसका कोई असरदार एंटीडोट नहीं था यही वजह है कि इस टॉक्सिन को कोल्ड वॉर के समय केमिकल हथियार के तौर पर भी देखा गया था. अब अमेरिका की नई रिसर्च ने इस दिशा में उम्मीद की नई किरण दिखाई है.

मेंढक के प्रोटीन ने किया कमाल
हालांकि, अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को (UCSF) के वैज्ञानिकों ने सैक्सिफिलिन नाम के एक प्रोटीन पर रिसर्च की. यह प्रोटीन बुलफ्रॉग और कई दूसरी मेंढक प्रजातियों में नैचुरली पाया जाता है. रिसर्च में पता चला कि यह प्रोटीन खून में मौजूद सैक्सिटॉक्सिन से मजबूती से चिपक जाता है. इससे टॉक्सिन नसों और मांसपेशियों तक पहुंचने से पहले ही बेअसर हो जाता है और शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा पाता.
चूहों पर टेस्ट में मिले शानदार नतीजे
ज्ञात हो कि, वैज्ञानिकों ने इस प्रोटीन का टेस्ट उन चूहों पर किया जिन्हें सैक्सिटॉक्सिन की जानलेवा मात्रा दी गई थी. जब सैक्सिफिलिन को टॉक्सिन से पहले या उसके साथ दिया गया, तो चूहे सुरक्षित रहे यहां तक कि जिन चूहों को टॉक्सिन मिलने के बाद यह प्रोटीन दिया गया, उनमें भी ज्यादातर की जान बच गई वैज्ञानिकों का कहना है कि यह नतीजा असली जीवन की उस स्थिति जैसा है, जब कोई व्यक्ति गलती से जहरीली शेलफिश खा लेता है.
शरीर में हर जगह पहुंचा प्रोटीन
वहीं, रिसर्च के दौरान यह भी देखा गया कि सैक्सिफिलिन सिर्फ खून तक सीमित नहीं रहा. यह शरीर के अलग-अलग हिस्सों जैसे दिमाग, दिल और मांसपेशियों तक पहुंच गया जहां-जहां टॉक्सिन पहुंचने की कोशिश करता, वहां यह प्रोटीन उसे रोक देता था अच्छी बात यह रही कि टेस्ट के दौरान कोई बड़ा साइड इफेक्ट भी सामने नहीं आया. इससे वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आगे चलकर यह इलाज के तौर पर काम आ सकता है.
लगभग 100 साल पुरानी रिसर्च से मिला नया सुराग
दरअसल, इस खोज की शुरुआत आज की नहीं, बल्कि करीब 100 साल पहले हुई थी 1920 और 1930 के दशक में वैज्ञानिक हरमन सोमर ने कैलिफोर्निया के समुद्री इलाकों में शेलफिश पॉइजनिंग पर रिसर्च की थी. उन्होंने पाया था कि यह जहर शेलफिश खुद नहीं बनाती, बल्कि उससे जुड़े छोटे जीव बनाते हैं. उसी दौरान यह भी देखा गया कि कुछ मेंढकों पर इस टॉक्सिन का असर नहीं होता. आज की रिसर्च ने उस पुराने सवाल का जवाब भी दे दिया है.
आगे और बेहतर इलाज बनाने की तैयारी
फिलहाल, वैज्ञानिकों का कहना है कि सैक्सिटॉक्सिन का सिर्फ एक नहीं, बल्कि 50 से ज्यादा अलग-अलग रूप हैं. नई स्टडी में पता चला कि सैक्सिफिलिन इन कई रूपों से जुड़ सकता है अब रिसर्च टीम इस प्रोटीन का छोटा और ज्यादा असरदार वर्जन बनाने पर काम कर रही है अगर इसमें सफलता मिलती है, तो भविष्य में कई तरह के सैक्सिटॉक्सिन के खिलाफ एक असरदार एंटीडोट तैयार किया जा सकता है.समुद्री इलाकों में रहने वाले लोगों और समुद्री भोजन खाने वालों की सुरक्षा और बेहतर हो सकती है साथ ही दूसरे नैचुरल टॉक्सिन के इलाज खोजने में भी यह रिसर्च नई राह खोल सकती है ये रिसर्च Nature Communications जर्नल में छपी थी.


















