Chanakya Niti: माता पिता को जरूर जान लेनी चाहिए चाणक्य नीति की ये बाते, तभी बच्चों के बन पाएंगे अच्छे दोस्त

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Chanakya Niti Quotes: आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में माता-पिता के कर्तव्यों के बारे में विस्तार से बताया है। दूसरे अध्याय के 11वें श्लोक में माता-पिता को बच्चों के लिए शत्रु समान बताया गया है। इसमें बच्चों की स्थिति को हंसों के झुंड में बगुले की तरह बताया गया है।

Chanakya Niti in Hindi : आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में जीवन को सफल, अनुशासित और सुखमय बनाने के लिए कई बातों का जिक्र किया है। चाणक्य नीति में बताए गए धर्म, अर्थ और मानव व्यवहार पर आधारित सिद्धांतों का अनुसरण करके व्यक्ति अपने जीवन को सफल बना सकता है। आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में माता-पिता के कर्तव्यों के बारे में भी विस्तार से बताया है। इसमें उन्होंने कुछ माता-पिता को बच्चों के लिए शत्रु समान बताया है।



पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः ।।

माता-पिता के कर्तव्य

ज्ञात हो कि, चाणक्य नीति के दूसरे अध्याय के 10वें श्लोक में कहा गया है कि बुद्धिमान लोगों को अपने पुत्र और पुत्रियों को अनेक प्रकार के अच्छे गुणों से युक्त करना चाहिए। उन्हें अच्छे कार्यों में लगाना चाहिए। क्योंकि नीति जानने वाले और अच्छे गुणों से युक्त सज्जन स्वभाव वाले व्यक्ति ही कुल में पूजनीय होते हैं।


वहीं, इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बचपन में बच्चों को जैसी शिक्षा दी जाएगी, उनके जीवन का विकास उसी प्रकार का होगा। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को ऐसे मार्ग पर चलाएं, जिससे उनमें चातुर्य के साथ-साथ शील स्वभाव का भी विकास हो। गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा होती है।


माता शत्रु पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।।

बच्चों के शत्रु समान होते हैं ये माता-पिता

दरअसल, दूसरे अध्याय के 11वें श्लोक में कहा गया है कि वे माता-पिता बच्चों के शत्रु समान होते हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया नहीं। क्योंकि अनपढ़ बालक विद्वानों के समूह में शोभा नहीं पाता और उसका हमेशा तिरस्कार होता है। विद्वानों के समूह में उसका अपमान उसी प्रकार होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है।


फिलहाल, आचार्य चाणक्य कहते हैं कि केवल मनुष्य जन्म लेने से ही कोई बुद्धिमान नहीं हो जाता। उसके लिए शिक्षित होना अत्यन्त आवश्यक है। शक्ल-सूरत, आकार-प्रकार तो सभी मनुष्यों का एक जैसा होता है, लेकिन उनकी बुद्धि से ही अंतर पता चलता है। जिस प्रकार सफेद बगुला सफेद हंसों में बैठकर हंस नहीं बन सकता। उसी प्रकार अशिक्षित व्यक्ति शिक्षित व्यक्तियों के बीच में बैठकर शोभा नहीं पा सकता। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें, जिससे वे समाज की शोभा बन सकें।

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