GK: गुलाबी रिबन कैसे बना ब्रेस्ट कैंसर का प्रतीक? आइए जानें ये है असली कहानी!

🇮🇳

नई दिल्ली। अक्टूबर शुरू होते ही अस्पतालों समेत कई इमारतों पर गुलाबी रिबन नजर आने लगते हैं. यह रंग अब ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ जंग की पहचान बन चुका है. बहुत कम लोग जानते हैं कि यह रिबन शुरू में गुलाबी था ही नहीं. उसके पीछे एक आम महिला की कोशिश थी. अक्टूबर को ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत 1985 में हुई, जबकि गुलाबी रिबन वाला अभियान 1992 में आया.करीब सात साल तक यह महीना बिना किसी साझा प्रतीक के मनाया जाता रह.

इस कहानी की शुरुआत कैलिफोर्निया की चार्लोट हेली से होती है. हेली की दादी की मौत 45 साल की उम्र में ब्रेस्ट कैंसर से हुई थी, और उनकी बहन और बेटी दोनों इस बीमारी से उबर चुकी थीं. उन्होंने इस बीमारी को अपने परिवार में करीब से देखा था. हेली के पीच रंग के रिबन उनके डाइनिंग रूम में हाथ से बनाए जाते थे.

पहला रिबन गुलाबी नहीं, पीच था

हेली का मकसद सिर्फ हमदर्दी जताना नहीं था. वे रिबन के साथ ए.क कार्ड भी देती थीं, जिसमें लिखा होता था कि रिबन पहनकर हम सांसदों और पूरे अमेरिका को जगा सकते हैं. उनकी शिकायत थी कि कैंसर के बजट का बहुत छोटा हिस्सा रोकथाम पर खर्च होता है. यह चुपचाप सजावट के लिए पहना जाने वाला रिबन नहीं था. यह सरकारों से सवाल पूछने का एक छोटा हथियार था.


October Breast Cancer Awareness Month
अक्टूबर को ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता माह में मनाया जाता है.

जब सेल्फ मैगजीन और एस्टी लॉडर आईं
बात 1992 की है. सेल्फ पत्रिका की प्रधान संपादक एलेक्जेंड्रा पेनी अपने ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता माह वाले दूसरे विशेषांक की तैयारी कर रही थीं. पिछले साल का अंक एस्टी लॉडर की वरिष्ठ अधिकारी और ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर एवलिन लॉडर की मदद से बना था और बहुत सफल रहा था.

इसी बीच एक अखबार के कॉलम में हेली के पीच रिबन का जिक्र हुआ. पेनी ने हेली को फोन कर अपने राष्ट्रीय अभियान में उनका आइडिया इस्तेमाल करने की इजाजत मांगी, लेकिन हेली ने इसे ‘बहुत ज्यादा कमर्शियल’ बताकर साफ मना कर दिया. हेली एक जमीनी आंदोलन को कंपनियों के हाथ में नहीं देना चाहती थीं.

पेनी और लॉडर ने वकीलों से सलाह ली. बाद में रिबन का रंग बदलने का रास्ता निकाला गया और पीच की जगह गुलाबी चुना गया. हेली के अपने शब्दों में, उन्हें बताया गया कि अगर वे रिबन चाहते हैं तो बस रंग बदल दें. इस पर दोनों पक्षों की राय अलग है. हेली का कहना था कि पत्रिका ने उनसे आइडिया छोड़ने को कहा था. पेनी के मुताबिक कंपनी ने निर्माण से जुड़े फैसले खुद लिए और उनका काम अभियान का प्रचार था.


Pink Ribon
अक्टूबर 1992 में गुलाबी रिबन ने बड़े स्तर पर दस्तक दी थी.

15 लाख रिबन और एक कार्ड

अक्टूबर 1992 में गुलाबी रिबन ने बड़े स्तर पर दस्तक दी. उस साल पतझड़ में एस्टी लॉडर के मेकअप काउंटरों पर 15 लाख रिबन बांटे गए, और हर रिबन के साथ एक लैमिनेटेड कार्ड था जिसमें ब्रेस्ट सेल्फ-एग्जाम का सही तरीका बताया गया था. यानी रिबन के साथ जांच की सीख भी जा रही थी. यही इस अभियान की ताकत बनी.

इसी दौर में रिबन पहनना एक वैश्विक चलन बन रहा था. रिबन एड्स संकट सहित कई मुद्दों का प्रतीक बन गए थे, और न्यूयॉर्क टाइम्स ने 1992 को ‘रिबन का साल’ कहा. इस माहौल में गुलाबी रिबन तेजी से लोगों की जुबान और पहनावे में उतर गया. गुलाबी रंग को नरमी, देखभाल और स्त्रीत्व से जोड़ा गया, इसलिए लोग इससे आसानी से जुड़ पाए. कुछ ही सालों में इसने कैंसर जागरूकता को एक पहचान दे दी, जबकि शुरुआत करने वाली हेली का नाम पीछे छूट गया.

क्या गुलाबी रंग बिक्री का जरिया बन गया?

पिंक रिबन की सफलता के साथ सवाल भी उठे. इसे अक्सर ‘पिंक-वॉशिंग’ कहा जाता है. मतलब यह कि कंपनियां प्रोडक्ट पर गुलाबी रिबन लगाकर बिक्री बढ़ाती हैं, जबकि रिसर्च या मरीजों को मिलने वाली रकम कम होती है. कुछ कंपनियां ऐसी भी पाई गईं जिन्होंने मुनाफे का हिस्सा दान नहीं किया, या ऐसे उत्पादों पर रिबन लगाया जिनमें कैंसर पैदा करने वाले तत्व थे. ब्रेस्ट कैंसर एक्शन जैसे संगठन ‘थिंक बिफोर यू पिंक’ अभियान चलाकर लोगों को खरीदने से पहले पूछने की सलाह देते हैं कि पैसा कहां जा रहा है.

Please Share With Your Friends Also

‘जन-जन तक संदेश’ ( Jan Jan Tak Sandesh) यह छत्तीसगढ़ का एक तेजी से बढ़ता हुआ हिंदी न्यूज़ पोर्टल है। हमारा उद्देश्य सिर्फ खबरें पहुँचाना नहीं, बल्कि समाज की आवाज़ बनना है।

Leave a Comment