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Do You Know: क्या आपने ट्रेन टिकट के किनारों पर छोटे-छोटे छेद देखे हैं? जानिए इनका काम क्या होता है, रेलवे टिकट प्रिंटिंग कैसे होती थी और इसका इतिहास.
रेलवे टिकट में होते हैं कई छोटे-छोटे छेद
ट्रेन का टिकट खरीदते हुए आपने ध्यान दिया होगा कि उसके दोनों किनारों पर छोटे-छोटे छेद बने होते हैं. इन्हें देख कई लोग मानते हैं कि ये टिकट आसानी से फाड़ने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन असल में इनका काम टिकट की प्रिंटिंग से जुड़ा है और ये पुराने रेलवे प्रिंटिंग सिस्टम का अहम हिस्सा थे.
इन छोटे छेद को कहते हैं Sprocket Holes
छोटे-छोटे इन छेदों को स्प्रोकेट होल्स (Sprocket Holes) कहा जाता है. पुराने समय में जब ऑनलाइन टिकट या आधुनिक प्रिंटर नहीं थे, तब रेलवे लाखों यात्रियों के टिकट छापने के लिए लगातार चलने वाले लंबे पेपर रोल और खास तरह के प्रिंटर का इस्तेमाल करता था.
Dot-Matrix Printer से होता था टिकट प्रिंट
उस वक्त रेलवे टिकट छपाने के लिए Dot-Matrix Printers का इस्तेमाल होता था. इस प्रिंटर के अंदर छोटे-छोटे दांत वाले गियर लगे होते थे, जो टिकट के किनारों पर बने स्प्रोकेट होल्स में फिट हो जाते थे. गियर घूमते ही कागज को बिल्कुल सीधी लाइन में और नियंत्रित गति से आगे बढ़ाते थे, जिससे प्रिंटिंग सही जगह पर होती थी.

एक छोटी गलती भी पड़ सकती थी भारी
रेलवे टिकट पर ट्रेन नंबर, यात्रा की तारीख, स्टेशन, किराया और सीट जैसी जरूरी जानकारी छपती थी. अगर कागज थोड़ा भी इधर-उधर हो जाता, तो जानकारी गलत जगह छप सकती थी; स्प्रोकेट होल्स कागज को सही जगह पर बनाए रखने में मदद करते थे.
Thermal Printer ने बदली पूरी व्यवस्था
समय के साथ रेलवे ने पुराने शोर करने वाले Dot-Matrix Printers की जगह तेज और शांत Thermal Printers का इस्तेमाल शुरू किया. इनमें कागज को आगे बढ़ाने के लिए दांत वाले गियर और स्प्रोकेट होल्स की जरूरत नहीं पड़ती थी, क्योंकि Roller-based System कागज को आगे करता है.
अब टिकट और छेद दोनों देखना इतिहास
आज ज्यादातर यात्री ऑनलाइन टिकट बुक करते हैं और सफर के दौरान मोबाइल पर E-Ticket या PNR दिखा देते हैं. इस डिजिटल दौर में पुराने कागजी टिकट और उनके किनारों के छोटे-छोटे छेद भारतीय रेलवे की उस तकनीक की याद बन गए हैं, जिसने दशकों तक लाखों टिकटों की सटीक छपाई में मदद की.
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