Health Tips : क्या है थैलेसीमिया की बीमारी, बच्चे कैसे आते हैं इसकी चपेट में, जानें सबकुछ

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हेल्थ डेस्क, नई दिल्ली। जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर्स को थैलेसीमिया पुकारा जाता है. ये बच्चों में होने वाली एक गंभीर बीमारी है. अगर किसी को अपनी चपेट में लेती है तो लंबे समय तक पूरे परिवार को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. जानें आखिर ये क्या होती है, इसके लक्षण क्या है और इससे बचाव के लिए किन कदमों को उठाना सबसे जरूरी है.

थैलेसीमिया एक ऐसी जेनेटिक ब्लड डिजीज, जो लोगों की सोच से कहीं ज्यादा आम है. दुनिया भर में लगभग 1.5% लोग बीटा-थैलेसीमिया जीन के कैरियर हैं. भारत में हर साल 10,000 से ज्यादा बच्चे थैलेसीमिया मेजर के साथ जन्म लेते हैं. यह बीमारी माता-पिता से बच्चों में जीन के जरिए पहुंचती है. कई बार जो लोग इसके कैरियर होते हैं, उनमें कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए उन्हें लंबे समय तक पता ही नहीं चल पाता कि वे इस जीन को आगे बढ़ा सकते हैं.



जागरूकता और समय पर जांच की कमी के कारण यह समस्या अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. यही वजह है कि थैलेसीमिया सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि पब्लिक हेल्थ से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा भी है.

शुरुआती लक्षण

डॉक्टर गीतिका जस्सल (मेडिकल स्पोक्सपर्सन, क्रायोविवा लाइफ साइंसेज) कहती हैं कि थैलेसीमिया की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके शुरुआती लक्षणों को अक्सर सामान्य कमजोरी या खून की कमी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. इस बीमारी की चपेट में आने वाले बच्चों में लगातार थकान, त्वचा का पीला पड़ना, कमजोरी, वजन और लंबाई का सही तरीके से न बढ़ना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कई बार बीमारी का पता तब चलता है, जब यह काफी गंभीर हो चुकी होती है.

क्या होते हैं नुकसान

डॉक्टर गीतिका ने बताया अगर समय रहते जांच और सही इलाज न मिले, तो थैलेसीमिया मेजर जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है. इससे दिल, लिवर और अन्य अहम अंग प्रभावित हो सकते हैं. इतना ही नहीं हड्डियों के साइज में बदलाव आ सकता है. मरीज को बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ सकती है. इसका असर न केवल रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है, बल्कि जीवन अवधि और जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है.

जन्म से पहले और बाद की स्क्रीनिंग क्यों है जरूरी

एक्सपर्ट ने बताया थैलेसीमिया से बचाव का सबसे अच्छा तरीका सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि समय पर जांच और जागरूकता है. एक साधारण ब्लड टेस्ट से यह पता लगाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति थैलेसीमिया जीन का कैरियर है या नहीं, खासकर उन कपल्स में जो परिवार शुरू करने की योजना बना रहे हैं. यदि माता और पिता दोनों कैरियर हों, तो हर प्रेग्नेसी में बच्चे के थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित होने का खतरा 25% तक हो सकता है.

वहीं, ऐसे में शादी से पहले की जांच, प्रेगनेंसी से पहले की स्क्रीनिंग, टेस्ट और जेनेटिक काउंसलिंग परिवारों को समय पर सही फैसला लेने में मदद कर सकते हैं. जिन देशों में नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रम लागू किए गए हैं, वहां थैलेसीमिया से प्रभावित बच्चों के जन्म में काफी कमी आई है. यह दिखाता है कि जागरूकता, समय पर जांच और सही सलाह इस बीमारी की रोकथाम में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.



बीमारी को ऐसे किया जाता है मैनेज

हालांकि, थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित मरीजों को अक्सर पूरी जिंदगी नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और शरीर में बढ़ने वाले अतिरिक्त आयरन को नियंत्रित करने के लिए दवाओं की जरूरत पड़ती है. हालांकि, मेडिकल साइंस में लगातार हो रही प्रोग्रेस से इलाज के नए विकल्प सामने आ रहे हैं. कुछ मरीजों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट बीमारी से लंबे समय तक राहत देने या उसे ठीक करने का प्रभावी तरीका साबित हो सकता है.

वहीं, जीन थेरेपी पर चल रहा शोध भी भविष्य के लिए नई उम्मीद जगा रहा है. इन नई तकनीकों से आने वाले समय में थैलेसीमिया का इलाज और प्रबंधन बेहतर हो सकता है. हालांकि, इन उपचारों की ऊंची लागत और सभी मरीजों तक उनकी सीमित पहुंच अब भी बड़ी चुनौती है. इसलिए थैलेसीमिया की समय पर पहचान, स्क्रीनिंग और जागरूकता आज पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है.

रोकथाम की दिशा में सामूहिक जिम्मेदारी

दरअसल, थैलेसीमिया काफी हद तक रोकी जा सकने वाली बीमारी है. जागरूकता, नियमित स्क्रीनिंग, समय पर डायग्नोसिस और जिम्मेदार जेनेटिक काउंसलिंग के माध्यम से लोग बेहतर स्वास्थ्य संबंधी निर्णय ले सकते हैं. साथ ही, परिवारों और स्वास्थ्य व्यवस्था पर इस बीमारी के बढ़ते बोझ को भी कम किया जा सकता है.

फिलहाल, अब समय केवल इलाज पर ध्यान देने का नहीं, बल्कि रोकथाम को प्राथमिकता देने का है. क्योंकि जेनेटिक बीमारियों के मामले में आज जो समस्या पहचान से छूट जाती है, वह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित कर सकती है.

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