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नई दिल्ली। भारत में महिलाओं के काम करने को लेकर तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है. लंबे समय तक देश में बड़ी संख्या में महिलाएं घर के काम, बच्चों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित रही हैं.
इसके चलते महिलाओं की वर्कफोर्स में भागीदारी कई सालों तक कम रही. लेकिन, पिछले कुछ सालों में हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं. भारत में काम करने वाली महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है और अब देश की कुल वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी पहले के मुकाबले काफी ज्यादा है.
डेटा फॉर इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में भारत की वर्कफोर्स में महिलाओं की संख्या करीब 10 करोड़ थी, जो 2024 तक बढ़कर 20 करोड़ से ज्यादा हो गई. यानी करीब छह साल में महिला वर्कफोर्स दोगुने से भी ज्यादा हो गई. यह बदलाव निश्चित तौर पर बड़ा और पॉजिटिव है. महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण भारत और कृषि क्षेत्र से आया है. 2025 में देश की कुल वर्कफोर्स में करीब हर तीन में से एक व्यक्ति महिला थी. लेकिन, गांव और शहर की तस्वीर काफी अलग है.
महिलाओं की हिस्सेदारी कितनी फीसदी बढ़ी?
ग्रामीण वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 38% है, जबकि शहरी इलाकों में यह करीब 25% है. महिलाओं के रोजगार में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खासकर खेती और उससे जुड़े कामों से आया है. कृषि क्षेत्र में काम करने वाली वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब आधी है. वहीं इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर, जहां आमतौर पर ज्यादा वेतन और औपचारिक रोजगार के अवसर मिलते हैं, उनमें महिलाओं की हिस्सेदारी एक चौथाई से भी कम है.
महिलाओं के रोजगार की बदलती तस्वीर-
2018 से 2024 के बीच महिला वर्कफोर्स दोगुने से ज्यादा हुई
2025 में हर तीन वर्कर में करीब एक महिला थी
ग्रामीण वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 38%
शहरी वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 25%
कृषि क्षेत्र की वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब आधी
इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर में हिस्सेदारी एक चौथाई से कम
सबसे बड़ा बदलाव खेती और पशुपालन में दिखा
महिलाओं की बढ़ती वर्कफोर्स का सबसे बड़ा हिस्सा ग्रामीण और कृषि गतिविधियों से जुड़ा है. खेती के अलावा डेयरी और पशुपालन में भी महिलाओं की भागीदारी काफी ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक, डेयरी और पशुपालन से जुड़े कामों में करीब 10 में से 8 कामगार महिलाएं हैं. इसमें गाय-भैंस पालने, दूध उत्पादन और भेड़, बकरी और मुर्गी पालन जैसे काम शामिल हैं.
अकेले इस तरह की गतिविधियों से कृषि क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का पांचवां हिस्सा से ज्यादा जुड़ा हुआ है. पिछले दो दशकों में पुरुषों का एक हिस्सा खेती से निकलकर निर्माण, परिवहन, व्यापार और दूसरे गैर-कृषि कामों की तरफ गया है. ऐसे में खेती और पशुपालन जैसे कामों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ती गई.
शहरों में महिलाओं की हिस्सेदारी कम क्यों?
ज्ञात हो कि, शहरी भारत में महिलाओं की वर्कफोर्स में भागीदारी ग्रामीण इलाकों से काफी कम है. 2025 में शहरों की वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 25% थी. हालांकि, शहरी क्षेत्रों में भी महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ी है. लेकिन यहां रोजगार की प्रकृति ग्रामीण क्षेत्रों से अलग है. गांव में किसी महिला का खेती, डेयरी या पशुपालन से जुड़ना और शहर में किसी महिला का नियमित वेतन वाली नौकरी करना एक जैसा रोजगार नहीं है. दोनों में आय, नौकरी की सुरक्षा, काम के घंटे और सामाजिक सुरक्षा के स्तर में बड़ा अंतर हो सकता है.

बेहतर और ज्यादा कमाई वाले काम मिल रहे हैं?
वहीं, महिलाओं की रोजगार में बढ़ती भागीदारी सकारात्मक बदलाव है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. महिलाओं के नए रोजगार में कृषि की भूमिका बड़ी रही है, जबकि पुरुषों के लिए इंडस्ट्री, निर्माण, परिवहन और व्यापार जैसे गैर-कृषि क्षेत्र ज्यादा अहम रहे. घरेलू काम भी महिलाओं के रोजगार का बड़ा हिस्सा है. भारत में 70% से ज्यादा घरेलू कामगार महिलाएं हैं. पिछले 25 वर्षों में घरेलू कामगार महिलाओं की संख्या करीब 10 लाख से बढ़कर 54 लाख हो गई है. इससे पता चलता है कि महिलाओं की वर्कफोर्स बढ़ी है, लेकिन कम मजदूरी, नौकरी की असुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं.
20 और 30 की उम्र में क्यों बढ़ जाता है अंतर?
दरअसल, भारत में महिलाओं के रोजगार की बड़ी चुनौती शादी और परिवार की जिम्मेदारियों से भी जुड़ी है. खासकर 20 से 30 साल की उम्र में पुरुषों और महिलाओं की वर्कफोर्स भागीदारी में बड़ा अंतर दिखता है. इसी दौरान शादी, बच्चों की देखभाल और घर की जिम्मेदारियों के चलते कई महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं. बाद में दोबारा रोजगार में लौटना उनके लिए आसान नहीं होता. इसलिए सिर्फ नौकरियां बढ़ाना काफी नहीं है. क्रेच और डे-केयर, सुरक्षित यात्रा, कार्यस्थल पर सुरक्षा, मातृत्व सुविधाएं, लचीले काम के विकल्प और समान वेतन जैसी सुविधाएं जरूरी हैं. इससे महिलाएं नौकरी में लंबे समय तक बनी रह सकेंगी.

सरकारी आंकड़े भी बढ़ती भागीदारी की पुष्टि करते हैं
फिलहाल, महिलाओं की बढ़ती रोजगार भागीदारी की पुष्टि सरकारी आंकड़े भी करते हैं. श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की महिलाओं का LFPR 2017-18 में 23.3% था, जो 2023-24 में बढ़कर 41.7% हो गया. इसी दौरान महिला WPR भी 22% से बढ़कर 40.3% पहुंच गया. अगस्त 2025 में महिला WPR 32% और LFPR 33.7% रहा. औपचारिक रोजगार में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. EPFO के अनुसार, 2024-25 में 26.9 लाख नई महिला सदस्य जुड़ीं. जुलाई 2025 में करीब 2.80 लाख नई महिला सदस्य जुड़ीं, जबकि महिला पेरोल में 4.42 लाख की बढ़ोतरी हुई.


















