Radha Ashtami Katha: क्यों हुआ राधा रानी का अवतार? जानें राधाष्टमी की कथा और धार्मिक महत्व

🇮🇳

Radha Ashtami Katha : सनातन परंपरा में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का अत्यंत विशेष स्थान है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति और प्रेम की प्रतिमूर्ति श्री राधा रानी का प्राकट्य दिवस  मनाया जाता है। शास्त्रों में माना गया है कि केवल श्री कृष्ण की भक्ति करने से जीव को तब तक पूर्ण कृपा प्राप्त नहीं होती, जब तक वह राधा रानी का आश्रय न ले। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गोलोक धाम में निवास करने वाली राधा रानी ने पृथ्वी पर अवतार क्यों लिय। तो आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व।

Radha Ashtami Katha

पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा रानी गोलोक में श्रीकृष्ण के साथ रहती थीं। एक दफा कृष्ण भगवान को गोलोक में राधा रानी कहीं नजर नहीं आईं। शाम तक जब राधा रानी नहीं मिली तो कन्हैया अपने सखा श्रीधामा और विशाखा सखी के साथ भ्रमण के लिए चले गए। यह बात जब राधा रानी को मालूम हुई, कि कृष्ण मेरे बिना ही भ्रमण के लिए चले गए हैं तो उन्हें बहुत ही क्रोध आया और वो सीधे कन्हैया के पास पहुंची। वहां पहुंचकर उन्होंने श्रीकृष्ण को काफी भला-बुरा कहा।

वहीं राधा रानी का यह रवैया भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे मित्र श्रीधामा को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। श्रीधामा ने उसी वक्त बिना कुछ सोचे समझे राधा रानी को पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दे दिया। ये सुन राधा रानी की आंखें क्रोध से भर गई और उन्होंने श्रीधामा को राक्षस कुल में जन्म लेने का श्राप दे दिया। श्री जी द्वारा दिए गए श्राप की वजह से ही श्रीधामा का जन्म शंखचूड़ दानव के रूप में हुआ। आगे चलकर वही दानव, भगवान विष्णु का परम भक्त बना। दूसरी तरफ, राधा रानी ने पृथ्वी पर वृषभानु के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया।

हालांकि राधा रानी का जन्म वृषभानुजी के घर तो हुआ, लेकिन उनकी पत्नी देवी कीर्ति के गर्भ से नहीं। दरअसल, जिस समय राधा रानी और श्रीधामा ने एक दूसरे को श्राप दिया था, तभी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि दे श्यामा आपको वृषभानुजी और देवी कीर्ति की पुत्री बनकर पृथ्वी पर रहना होगा। आप पृथ्वी पर भी मेरी ही बनकर रहेंगी। परंतु, हम दोनों को बिछड़ने का दुख सहना होगा।

वहीं संसार के सामने वृषभानुजी की पत्नी गर्भवती हुईं। जिस तरह एक बच्चा दुनिया में आता है, ठीक वैसे ही देवी कीर्ति का भी प्रसव हुआ, लेकिन असल में राधा रानी का जन्म देवी कीर्ति के गर्भ से नहीं हुआ था। भगवान की माया से उनके गर्भ में वायु भर गई थी। देवी कीर्ति ने उसी वायु को जन्म दिया। इस दौरान जब राजा वृषभानु यमुना नदी में स्नान करने गए, तब उन्हें जल में एक चमकता हुआ स्वर्ण कमल का फूल मिला। वह कमल हजारों सूर्यों की तरह चमक रहा था। उस कमल पर एक बहुत सुंदर दिव्य कन्या विराजमान थीं।

दरअसल वृषभानु जी कुछ समझ पाते, उससे पहले वहां भगवान ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उन्होंने वृषभानु जी से कहा- “हे वृषभानु महाराज! आप बहुत भाग्यशाली हैं। यह कोई साधारण कन्या नहीं हैं। ये स्वयं सभी जीवों की दिव्य माता और परम शक्ति हैं। ब्रह्मा जी ने बताया कि पिछले जन्म में वृषभानु जी और उनकी पत्नी कीर्ति देवी ने कठोर तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी कि स्वयं देवी लक्ष्मी उनकी पुत्री के रूप में उनके घर आएं। उनकी इसी भक्ति और इच्छा को देखते हुए भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमती राधारानी को उनकी पुत्री के रूप में भेजा। ब्रह्मा जी ने उस दिव्य बालिका को वृषभानु जी की गोद में सौंप दिया और उनकी देखभाल करने के लिए कहा।

फिलहाल इसके बाद वे अपने लोक लौट गए। वृषभानु जी अत्यंत प्रसन्न होकर बालिका को अपने घर ले आए। माता कीर्ति देवी भी अपनी पुत्री को देखकर बहुत खुश हुईं। धीरे-धीरे यह खबर आसपास के गांवों में फैल गई कि वृषभानु जी के घर एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ है। उन्हें प्रसव पीड़ा हो रही थी और वहां श्री जी  के रूप में एक प्यारी सी कन्या ने जन्म लिया। भाद्रमास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन राधा मैया का धरती पर जन्म हुआ था। तभी से हर साल इस दिन को राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। कहते हैं इस व्रत को करने से जन्माष्टमी के व्रत जितना ही फल प्राप्त होता है।

Please Share With Your Friends Also

‘जन-जन तक संदेश’ ( Jan Jan Tak Sandesh) यह छत्तीसगढ़ का एक तेजी से बढ़ता हुआ हिंदी न्यूज़ पोर्टल है। हमारा उद्देश्य सिर्फ खबरें पहुँचाना नहीं, बल्कि समाज की आवाज़ बनना है।

Leave a Comment